बहुत अप्रिय प्रश्न है, पर है ! क्या अब देश सेना के हवाले करना होगा?

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Will the country have to hand over the army now?

क्या अब देश सेना के हवाले करना होगा?

बहुत अप्रिय प्रश्न है। जवाब बहुत मुश्किल है।

जिस तेजी से कोरोना संक्रमण बढ़ता जा रहा है (Corona infection continues to grow) और जांच न होने के कारण अज्ञात संक्रमितों की पहचान और उनको अलग रखना कठिन है, तो 138 करोड़ के घनी आबादी वाले देश में महामारी के संक्रमण को धीमा करने का लॉकडाउन के अलावा फिलहाल कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है।

अभी रमजान का पाक महीना (Pak month of Ramadan) है। अपनी आस्था के मामले में  भारत के लोग बहुत संवेदनशील हैं। आगे पीछे सोचते नहीं हैं।

लॉकडाउन के बीच एक बैशाखी के मौके को छोड़कर बार-बार लॉक डाउन टूटा है।

रमजान का महीना शुरू होते ही सरकार, प्रशासन, मीडिया, नेता, मौलाना, मौलवी की अपील के बावजूद देशभर में व्यापक पैमाने पर लॉक डाउन तोड़कर लोग घरों से निकलकर बाजार में भीड़ बन रहे है।

दिल्ली की हालत मुंबई और महराष्ट्र के बाद सबसे खराब है। वहां भी केंद्र औऱ राज्य सरकारों की नाक के नीचे चांदनी चौक जैसे इलाके में जिस तर भीड़ उमड़ी है, उससे यही लगता है कि देर सबेर थर्ड स्टेज के संक्रमण से जनता और देश को बचाने के लिए सेना उतारने के अलावा कोई रास्ता बचा नहीं है।

इस महामारी में अमेरिका और यूरोप के हालात से किसी ने सबक नहीं सीखा है।

चीन को कोरोना मुक्त घोषित करने के बाद जिस तरह से नए सिरे से संक्रमण फैल रहा है, उससे जल्दी कोरोना महामारी और लॉक डाउन से आजादी के आसार नहीं हैं।

संसदीय मौकापरस्त राजनीति बुरी तरह फेल है।

देश के संकट में फिर 1971 की तरह राजनीति से ऊपर उठने और पूरे देश को एकजुट होने की सख्त जरूरत है।

लेकिन सत्ता की राजनीति (Power politics) ने सत्तर के दशक से जाति, धर्म, नस्ल, भाषा, क्षेत्र के नाम पर जो ज़हर बोया है, उसकी असली लहलहाती फसल काटने को हम मजबूर हैं।।

कोरोना से भले ही देर सवेर कुछ लाख लोगों की जान और करोड़ों लोगों की रोटी रोज़ी के बदले हमें निजात मिल जाये, इस ज़हर के वायरस से आज़ाद होना मुश्किल है।

जिसतरह लॉक डाउन बिना तैयारी के हुआ, उसी तरह रमजान महीने में मुसलमानों को रोज़ा का सामान घर तक पहुंचाने की तैयारी नहीं की गई। मुसलमानों की आस्था की परवाह नहीं की गई।

अब बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मुसलमानों की कोई आस्था देश की जनता, सरकार, मीडिया, न्यायपालिका, संस्थाओं में बची नहीं है।

इसके खतरनाक नतीजे होंगे।

प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं कि कोरोना जाति, धर्म, नस्ल, भाषा नहीं देखेगा। उनके बयान का आशय उनके नाम का जयकारा लगाने वाली थाली ताली दिया जमात भी समझ नहीं पा रही है।

किसी भी समुदाय को हाशिये पर रखकर हम न अपनी जान बचा सकते है, न जहां।

अमेरिका के बाद ब्रिटेन में भी कोरोना के शिकार काले और गरीब लोग हैं।

हमारे यहां मुसलमान, दलित और आदिवासी गरीब है और असमानता और अन्याय के शिकार भी। वे नौकरी, रोजगार और आजीविका के अवसरों से वंचित हैं। उनमें कुछ धनी जरूर हैं, लेकिन अभी पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग नहीं है। उनके अपने बुद्धिजीवी नहीं हैं। वे जितने कुपोषण के शिकार हैं, उतने ही अंध विश्वास के भी।

उनका सिर्फ वोट बैंक बतौर राजनीतिक इस्तेमाल होता है। वे नेता और धर्मगुरु के बहकावे में जान की बाज़ी लगा सकते हैं। वे ज़िंदगी से कुछ ज्यादा उम्मीद नहीं रखते और मरने जीने में उन्हें कुछ ज्यादा फर्क नज़र नहीं आता। संक्रमण उनमें ज्यादा फैलेगा यूरोप और अमेरिका की तरह। मरेंगे भी वे ही सबसे ज्यादा।

लेकिन उन्हें इसका न अंदेशा है और न वे इसकी ज्यादा परवाह करते हैं।

बाकी जनता के लिए यह स्थिति बहुत खतरनाक है।

Markaz was ignored in the Corona period for the political use of Muslims

Modi in Gamchha

  जमात के मरकज़ में क्या हुआ?

मुसलमानों के राजनीतिक इस्तेमाल के लिए मरकज़ की कोरोना काल में अनदेखी की गई। वीसा जारी कर दिए गए। फिर लॉकडाउन में उनके फंस जाने की जानकारी होते हुए समय पर उनको न निकल गया और न उनको अलग रख गया।

देशभर में मरकज़ से निकलकर बड़े पैमाने पर संक्रमण फैलने के बाद उन्हीं को जिम्मेदार बताकर घृणा और हिंसा का माहौल बनाया गया।

यह घृणा और हिंसा और इसकी सत्ता राजनीति से कोरोना क्या किसी भी संकट का मुकाबला करना सम्भव नहीं है।

JAILED & QUARANTINED FOLLOWERS ABANDONED BY TABLIGHI JAMAAT CHIEF

हम सत्तर के दशक से किसानों मज़दूरों गांवों को तबाह करते हुए देश को अमेरिका बनाने के चक्कर में खुल्ला बाज़ार बना चुके हैं।

जहां सिर्फ पैसे की ताकत है और आदमी औरत बच्चे बूढ़े युवा का मोल दो कौड़ी भी नहीं।

इससे भी बुरी बात यह है कि इस घृणा और नफरत की राजनीति में हम एक दूसरे की न सुन रहे हैं और न किसी की परवाह कर रहे हैं।

हम पाकिस्तान बन गए हैं।

और पाकिस्तान की तरह देश सेना के हवाले करने की नौबत आ गयी है।

लॉकडाउन शुरुआत में ही टूटने लगा था। दिल्ली में लाखों मजदूरों के पलायन का नज़ारा हम देख चुके हैं।

फिर मुंबई और सूरत में भी।

रोटी और रोज़ी के संकट से जूझ रहे किसान मजदूर की किसी को कोई परवाह नहीं है।

गरीबों के लिए जन धन खाता और मामूली खैरात। पूंजीपतियों को छूट, राहत और पैकेज के नाम खजाना लुटाया जा रहा है।

दुनिया भर में पैट्रोल पानी से भी सस्ता हो गया है।

हमारे यहां खास चहेते लोगों के मुनाफे की खातिर एक दमड़ी रियायत नहीं।

अब अर्थ व्यवस्था की बिगड़ती हालात से कारपोरेट और पूंजी का साम्राज्य ढहने लगा है।

जिस तरह अमेरिका बिना तैयारी के लॉकडाउन उठा रहा है। बाजार और कारपोरेट दबाव में भारत में भी ऐसा सम्भव है बिना तैयारी के।

मारे जाएंगे दलित, आदिवासी, मुसलमान, मजदूर और किसान सबसे ज्यादा लेकिन बाकी लोग भी अमेरिका और यूरोप की तरह कम नहीं मरेंगे।

खुद बचना है तो सबको बचाने की फिक्र कीजिये।

बहरहाल हम खुद बेहद परेशन हैं।

देश के लगभग सभी परिवारों की तरह हमारा परिवार भी देशभर में बिखर गया है।

हमारे गांव में तमाम लोग ऐसे हैं जो विभाजन के बाद आधे अधूरे होकर यहां तक पहुंचे थे 1952 में।

चेतन मण्डल लाउडस्पीकर के बारे में मैने अंग्रेजी में लिखा है।

उन दिनों लाउड स्पीकर नहीं था। आज की तरह घर-घर जाकर बुलाने की नौबत भी नहीं थी।

हमारे गांव के बीचोंबीच एक बड़ा सा मैदान था।। जो अब स्कूल, सांस्कृतिक मंच, नेताजी मंच और मंदिर के अलावा लगातार अतिक्रमण से सिकुड़ गया है।

इसी मैदान के बीचोंबीच खड़े होकर चेतन मण्डल 50,60 और 70 के दशक में आवाज़ लगाकर पूरे गांव को देखते-देखते एक्टर कर लेते थे।

यहां आने से पहले कोलकाता के काशीपुर कैम्प में संक्रामक  रोग से चेतन मण्डल के मां, बाप,पत्नी और बहन की मृत्यु हो गयी थी।

चेतन मण्डल अपने इकलौते बेटे फूलचंद के साथ बसंतीपुर आये थे।

हजारीलाल गये की बड़ी बेटी काली दीदी से उनकी शादी कराकर उनका परिवार बनाया गया था। गांव में ऐसे आधे अधूरे परिवार को मुकम्मल बनाने की अनेक कथाएं हैं।

आज कोरोना संकट में फिर हमारे आधे अधूरे बन जाने का खतरा है।

दिल्ली में मेरा भाई अरुण जहांगीरपुरा में ब्लॉक सी में रहता है।

एक बहन वीणा और उसकी बेटी सुचित्रा चक्रवर्ती झिलमिल कालोनी के प्रतापखण्ड में रहते हैं।

भाई सुभाष उत्तर 24 परगना के सोदपुर में हैं।

ये सारे इलाके हॉट स्पॉट हैं।

बहनों का ससुराल शक्तिफार्म, रामपुर और पीलीभीत, बिजनौर में है।

सविता जी का मायका भी बिजनौर में है।

दिल्ली में 26 फरवरी को अरुण की बेटी कृष्णा की शादी में हम लोग गए थे।

कृष्णा की मां झरना को शुगर है और हर हफ्ते उसे दो तीन बार डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

शादी से पहले कृष्णा की मां और बड़े मां बाबू एक साथ डायलिसिस पर थे। बाबू का निधन हो गया। कृष्णा की मां को शादी से पहले सदमे से बचाने की गरज से खबर नहीं दी गयी थी।

कृष्णा की शादी मुंबई के इंजीनियर पीतवास पटनायक से हुई। लॉक डाउन के वक्त वह गुजरात के मेहसाणा में थे। कृष्णा तमिलनाडु के तिरिचिरापल्ली विश्व विद्यालय में समुद्र विग्यान पर शोध कर रही है और वहीं होस्टल में थी। दामाद और बेटी लॉक डाउन की वजह से गुजरात और तमिलनाडु में फंसे हैं।

कोरोना संक्रमण की वजह से अरुण की जहाँगीपुर की गली सील है। उसकी फैक्टरी गाज़ियाबाद में है, जो बन्द है।

परसो कृष्णा की मां को डायलिसिस के लिए ले गए तो पता  चला कि अस्पताल में कोई कोरोना मरीज मिलने की वजह से अस्पताल को ही सील करने की नौबत है।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

डायलिसिस जो उसकी ज़िंदा रहने की शर्त है, नहीं हो सकी।

आज सविता जी की अरुण से लम्बी बातचीत हुई।

बसंतीपुर में ललित गुसाईं तराई के 50 के दशक के मतुआ सन्त थे। उन्होंनें मेरे चाचा डॉ. सुधीर विश्वास को धर्म पिता माना था। उनके यहां हर साल  मतुआ उत्सव होता है। इस उत्सव में ठाकुर नगर से दिवंगत मतुआ माता वीणा पानी देवी और उनके पुत्र दिवंगत सांसद कपिल कृष्ण ठाकुर भी आये थे। जो हमारे रिश्तेदार भी हैं।

ललितजी का परिवार से वही सम्बन्ध बना हुआ है। 70 साल में कुछ नहीं बदला।

उनका मंझले बेटे गोलक को हाई शुगर और रक्तचाप की वजह से रुद्रपुर के नर्सिंग होम में दाखिल कराया गया है। सोदपुर में ऐसे मौके पर दौड़ पड़ने वाली सविता जी बेचैन हैं और मुझे रोज़ कह रही है कि उसे देख आऊं।

मैं नही जा पाया। खबर है कि वह अब ठीक है ओर एक दो दिन में घर आ जायेगा।

खुद हम अपना चेक आप नहीं कर पा रहे। लोग कैसे गम्भीर बीमारियों में भी इलाज नहीं कर पा रहे हैं, इस बारे में लिखता रहा हूँ।

ये हालात हैं, जिनके कारण लॉक डाउन लम्बे खींचने की हालत में गम्भीर समस्याएं जीने मरने की बनती। जा रही हैं

ऐसे हालात से निबटने की कहीं कोई तैयारी नहीं है।

ऐसे में बड़े पैमाने पर लॉक डाउन टूटने पर देश को सेना के हवाले करने की नौबत आ ही सकती है।

पलाश विश्वास

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