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Agriculture Bill will destroy agriculture - Mazdoor Kisan Manch

क्या बदलाव की एक नयी इबारत लिख पायेगा किसानों का यह आंदोलन ?

Will this movement of farmers be able to write a new chapter of change?

2014 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रबल झंझावात के बल पर भाजपा/ एनडीए की सरकार बनी थी। उम्मीदें भी थीं, और गुजरात मॉडल का मायाजाल भी। नरेंद्र मोदी की क्षमता पर ज़रूरत से ज्यादा लोगों को भरोसा भी था। कांग्रेस का दस वर्षीय कार्यकाल खत्म हो रहा था। सबसे अधिक उम्मीद थी कि 2014 में जो वादे सरकार ने अपने संकल्प पत्र में जनता से किये थे, वे पूरे किए जाएंगे। पर वे वादे, वादे करने वाले तो भूल ही गए, उन्होंने उन्हें जुमला तक कह दिया और जिन्हें वादे याद दिलाने चाहिए थे, उन्हें धर्म की अफीम चटा दी गयी, और वे उसी पिनक में तब से पड़े हैं। जब ज़रा होश आता है, एक डोज और धर्म और धर्म से जुड़े बेमतलब के मुद्दों की अफीम पुनः चटा दी जाती है, और जनता एक नीम बेहोशी में पुनः पड़ जाती है।

इतने मुर्दा, होशफाख्ता और हवासगुम तो लोग देश के इतिहास में कभी रहे भी हैं या नहीं, इस पर लिखना एक रोचक विषय होगा। पर देश में कभी-कभी ऐसे दौर भी आते हैं।

People everywhere are worried today

आज अगर देश के आर्थिक स्थिति की बात करें तो देश के हर आर्थिक सूचकांक में निराशा भरी गिरावट दर्ज है और सांख्यिकी के नीरस और उबाऊ आंकड़ों को दरकिनार कर के अपने आस-पास नज़र दौड़ाएं तो, चाहे वह युवाओं की बेरोजगारी का मसला हो, या सामान्य आवश्यकताओं की चीज़ों की महंगाई का, हर तरफ लोग परेशान हैं और इसका हल ढूंढने के लिये सरकार की ओर देख रहे हैं। सरकार की आर्थिक नीति है क्या (What is the economic policy of the government) यह शायद सरकार को भी पता न हो। इसीलिए जब कोरोना महामारी ने दस्तक देना शुरू किया तो वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने मार्च में कहा था कि, इसका कोई असर देश की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ेगा। जब कि देश की अर्थव्यवस्था पर असर तो सरकार का अब तक का सबसे मूर्खतापूर्ण आर्थिक निर्णय, नोटबंदी के समय से ही पड़ चुका था और नोटबंदी के बाद, आज तक देश के विकास दर में जो गिरावट आना शुरू हुई है वह अब तक बरकरार है। कोरोना ने गिरने की गति को और तेज ही कर दिया है।

Demonetisation also led to an unprecedented increase in the unemployment rate in the country.

नोटबंदी ने छोटे और मध्यम बाजार, अनौपचारिक क्षेत्र की आर्थिकी, ग्रामीण क्षेत्र की छोटी छोटी बचतों वाली अर्थव्यवस्था को तो बर्बाद किया ही, देश में बेरोजगारी की दर में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी भी कर दी। अब स्थिति यह हो गयी है कि अर्थव्यवस्था बेपटरी है और इसे कैसे वापस पटरी पर लाया जाए। यह क्षमता न तो सरकार में है और न सरकार इस पर कुछ सोच रही है।

छोटे कारोबारियों का भट्टा बैठाने के बाद, सरकार ने किसानों को बर्बाद करने के लिये तीन नए कृषि कानून बनाये, जिसके विरोध में देश भर के किसान लामबंद हो गए हैं। किसानों को उपज के उचित मूल्य पर सरकार का कोई लिखित या कानूनी वादा नहीं है, जमाखोरी पर कानून खत्म कर उसे एक प्रकार से मान्यता दे दी गयी है, और किसानों के इस असंतोष पर किसानों से सरकार कोई बात तक करने को तैयार नहीं है।

नोटबंदी से व्यापार चौपट हुआ, अनौपचारिक क्षेत्र धराशायी हो गया, तीन कृषि कानून से देश भर के किसान बेहाल और आंदोलित हैं (तीन कृषि कानून से देश भर के किसान बेहाल और आंदोलित हैं) ही कि अब नए श्रम कानून लाने की बात होने लगी। नए श्रम कानूनों में एक शातिर बदलाव है, काम के घण्टों में कमी। आठ घंटे की अवधि के लिये दुनियाभर के श्रमिकों ने बेमिसाल संघर्ष के बाद यह उपलब्धि प्राप्त की है जिसे यह सरकार बढ़ा कर 12 घंटे करने जा रही है। हालांकि एक दो दिन अतिरिक्त अवकाश की बात भी की जा रही है, पर यह आगे कितना कारगर होगा यह तो समय ही बताएगा। नौकरियां तो बुरी तरह से जा ही रही हैं और जो कुछ भी नौकरियां आगे मिलने वाली हैं उनका स्वरूप संविदा पर आधारित होने जा रहा है। नियमित नौकरियां, जिसमें व्यक्ति निश्चिंतता से जीवन जी सके, अगर यही सरकार के नीतियों की भविष्य में दशा और दिशा रही तो, सपने की तरह हो जाएंगी।

सब कुछ संविदा पर करने को आमादा इस सरकार की एक भी आर्थिक नीति स्पष्ट नहीं है। अगर सरकार किसी एक उद्देश्य पर ‘बको ध्यान’ मुद्रा में है तो वह है सरकारी उपक्रमों को औने पौने दाम पर, चंद निजी घरानों को बेच देना। बीपीसीएल के निजीकरण (BPCL Privatization) की कवायद इसका सबसे नवीनतम उदाहरण है। रेलवे को निजीकृत करने का काम चल ही रहा है, एयरपोर्ट तो अडानी ग्रुप को सौंपे जा चुके हैं, खनन, कोयला तो धीरे धीरे हस्तांतरित हो ही रहा है, नयी बिजली नीति में निजीकरण की बात काफी आगे बढ़ गई है। तकनीकी शिक्षा संस्थानों में फीस बेतहाशा बढ़ा दी गयी है, सरकारी अस्पताल भी निजीकृत किये जाने की योजना है। यह भी आशंका निर्मूल नहीं है कि, लोककल्याणकारी राज्य की बात, और अनेकों अनुच्छेदों में फैला नीति निर्देशक तत्व बस अकादमिक बहस के मुद्दे ही बन कर न रह जायं। इन सबका बात-बात में उल्लेख कर, संविधान की शपथ लेकर सत्तारूढ़ होने वाली सरकार के पास लोककल्याणकारी राज्य के मूल कार्य शिक्षा और स्वास्थ्य भी नहीं बचेंगे, तो फिर सरकार करेगी क्या और किस तरह से जनता के प्रति जवाबदेह रहेगी ?

आज 26 नवम्बर से किसानों का दिल्ली चलो आंदोलन शुरू हो रहा है और देश के सभी महत्वपूर्ण उद्योग धंधे से जुड़े कामगारों की हड़ताल भी है। यह हड़ताल, एक प्रतिगामी शासन की उन प्रतिगामी नीतियों के खिलाफ है जो, देश को औपनिवेशिक राज में दुबारा पहुंचा सकते हैं। किसानों से यह वादा किया गया है, कि उनकी आय 2022 तक दुगुनी हो जाएगी। पर नए कृषिकानून से किसानों को यह ज्ञात हो गया है कि यह सब कानून केवल पूंजीपति घरानों को कृषि सेक्टर में घुसाने और देश की कृषि संस्कृति को बरबाद करने के उद्देश्य से लाया गया है। अगर यह कानून किसानों के हित में है तो यह सब किस प्रकार से किसानों के हित में है, यह बात सरकार सार्वजनिक रूप से किसानों और देश की जनता को बताती क्यों नहीं है ?

भारत में शोषण से मुक्ति पाने औऱ सम्मानजनक जीवन के लिये किसानों ने लम्बे समय तक अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन किये हैं। ब्रिटिश राज में ज़मींदारी प्रथा थी और उस प्रथा को खत्म कर के किसानों को उनके द्वारा जोते जाने वाली ज़मीन का मालिक बनाने की सोच स्वाधीनता संग्राम के समय से ही कांग्रेस के नेताओ की थी। कांग्रेस के इस प्रगतिशील और समाजवादी सोच के कारण भी कुछ बड़े मुस्लिम जमींदार मुस्लिम लीग में शामिल हुए थे क्योंकि लीग और एमए जिन्ना के तत्कालीन एजेंडे में समाज की आर्थिक मुद्दों से जुड़ा कोई एजेंडा था ही नहीं। वे तो धर्म के ही आधार पर एक मुल्क पाने की ज़िद पाले बैठे थे, और उनकी यह ज़िद पूरी हुई। इसलिए आज़ादी के बाद जहां भारत एक सुनियोजित आर्थिक एजेंडे पर आगे बढ़ा और वहीं पाकिस्तान इसी कवायद में उलझा रहा कि, कौन कैसा मुसलमान है।

Land Reforms in India

संविधान बनाते वक्त उसके निर्माताओं को जिन अहम मुद्दों से जूझना पड़ा, उनमें से एक भारत का सामंती सिस्टम था, जिसने स्वतंत्रता से पहले देश के सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह चोट पहुंचाई थी। उस वक्त जमीन का मालिकाना हक कुछ ही लोगों के पास था, जबकि बाकी लोगों की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती थीं। इस असमानता को खत्म करने के लिए सरकार कई भूमि सुधार कानून लेकर आई, जिसमें प्रमुख रूप से एक महत्वपूर्ण कानून, जमींदारी उन्मूलन कानून 1950 (Zamindari Abolition Act 1950) भी था।

सन 1947 में देश के आजाद होने के बाद जमींदारी उन्मूलन कानून, 1950 भारत सरकार का पहला प्रमुख कृषि सुधार कानून था। हालांकि जमींदारी सिस्टम के उन्मूलन की प्रक्रिया संविधान लागू होने से काफी पहले ही शुरू हो गई थी। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, मद्रास, असम और बॉम्बे 1949 में जमींदारी उन्मूलन बिल ले आए थे। इन राज्यों ने प्रारंभिक मॉडल के रूप में उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन समिति (इसके अध्यक्ष गोविंद बल्लभ पंत थे) की रिपोर्ट का इस्तेमाल किया था। लेकिन जमींदारों का संगठन अदालत पहुंच गया और यह कहा गया कि ऐसा करना, उनके मूल अधिकारों का उल्लंघन है।

जब संविधान पारित हुआ, तब, संपत्ति का अधिकार संविधान के अनुच्छेद, 19 और 31 के तहत मौलिक अधिकारों में की सूची में सम्मिलित था। लेकिन पहले संशोधन के तहत साल 1951 में सरकार ने मौलिक अधिकारों की सूची में संपत्ति के अधिकार (Property rights in the list of fundamental rights) को आंशिक रूप से संशोधित कर दिया गया। जो संशोधन किए गए वे इस प्रकार के हैं –

● सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को उन्नति के लिये विशेष उपबंध बनाने हेतु राज्यों को शक्तियाँ दी गईं।

● कानून की रक्षा के लिये संपत्ति अधिग्रहण आदि की व्यवस्था।

● भूमि सुधार तथा न्यायिक समीक्षा से जुड़े अन्य कानूनों को नौंवी अनुसूची में स्थान दिया गया।

● अनुच्छेद 31 में दो उपखंड 31(क) और 31 (ख) जोड़े गये।

इससे सरकार के भूमि सुधार कानूनों को फायदा पहुंचा। जमींदारी सिस्टम को खत्म करने में इसका बहुत बड़ा योगदान रहा। इस अधिनियम के मुख्य लाभार्थियों में अधिभोग या उच्च जोतदार थे, जिन्होंने जमींदारों से सीधे जमीन लीज पर ली और उसके आभासी मालिक बन बैठे। पूरे देश की राज्य सरकारों ने 1700 लाख हेक्टेयर्स भूमि का अधिग्रहण किया और जमींदारों को मुआवजे के तौर पर 670 करोड़ रुपये दिए गए। कुछ राज्यों ने फंड बना लिए और जमीन मालिकों को बॉन्ड दे दिए, जिन्हें 10-30 वर्षों बाद मुक्त कराया जा सकता था।

चूंकि भूमि राज्य का विषय है, इसलिए ज्यादातर राज्यों ने जमींदारों को भूमि के एक हिस्से पर खेती करने और उसे अपने पास रखने की इजाजत दे दी। लेकिन जमींदारों ने इसका फायदा उठाया और भूमि पर खुद खेती करनी शुरू कर दी, ताकि राज्य सरकार उनसे जमीन वापस न मांग सकें। इसीलिए 1951 के संशोधन में, अनुच्छेद 31(क) , 31(ख) और नौंवा शेड्यूल संविधान में जोड़े गए, ताकि जमींदारों को कानूनी आड़ लेने से रोका जा सके।

नौंवी अनुसूची में इसे सम्मिलित करने के बाद सरकार के कानूनों अदालत में, आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती थी। साथ ही राज्यों को कानून बनाने या किसी की संपत्ति या जमीन का अधिग्रहण करने का अधिकार भी मिल गया।

जमींदारी उन्मूलन कानून ने बेगारी या बंधुआ मजदूरी को कानूनन अपराध के दायरे में ला खड़ा किया।

जब ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार की बात की जाएगी तो देश के शीर्ष किसान नेता चौधरी चरण सिंह बरबस याद आएंगे। किसानों के मसीहा के रूप में याद किये जाने वाले चरण सिंह ने कृषि सुधार और कृषक उत्थान के लिए बहुत काम किया। भूमि सुधार एवं जमींदारी उन्मूलन कानून गरीब किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाकर उन्हें भूमिधर बनाने का एक क्रांतिकारी कदम था। जमींदारी प्रथा समाप्त हुई, शोषण से मुक्त हुए किसान भूमिधर बन गए। 1954 में योजना आयोग ने निर्देश दिया कि जिन जमींदारों के पास खुद काश्त के लिए जमीन नहीं है, उनको अपने आसामियों से 30 से 60 फीसदी भूमि लेने का अधिकार मान लिया जाए। चौधरी चरण सिंह के हस्तक्षेप से यह सुझाव उत्तर प्रदेश में नहीं माना गया, लेकिन अन्य प्रदेशों मे यह प्राविधान लागू हुआ। इसके बाद 1956 में उत्तर प्रदेश सरकार ने, जमींदारी उन्मूलन एक्ट में यह संशोधन किया कि कोई भी वह किसान, भूमि से वंचित नहीं किया जा सकेगा, जिसका किसी भी रूप में जमीन पर कब्जा हो।

ज़मीदारी उन्मूलन के बाद सरकार ने कृषि क्षेत्र में नए शोध हेतु अनेक वैज्ञानिक केंद्रों और संस्थाओं की स्थापना की, हरित क्रांति की सूत्रपात हुई, शोधों को प्रयोगशाला से ज़मीन तक पहुंचाने के लिये लैब टू लैंड की योजनाएं (Lab to Land Programme in Hindi) अमल में लायी गयीं। डीज़ल, खाद, बिजली पर सब्सिडी दी गयी। कृषि उपज के न्यूनतम मूल्य देने की परंपरा शुरू हुई। उसे और वैज्ञानिक स्वरूप बनाने के लिये डॉ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया, जिसने अपनी संस्तुतियां दीं और वही संस्तुतियां, जिसमें प्रमुख रूप से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एक प्रमुख बिन्दु है, और उसे तय करने का एक फार्मूला उक्त आयोग ने दिया है। इस बिन्दु को राजनीतिक दलों ने लपक तो लिया, पर केवल किसानों के वोट के लिये, न कि सरकार में आकर उसे लागू करने के लिये।

धीरे-धीरे, विश्व बैंक और अमेरिकी पूंजीपतियों के दबाव में भारत के खेती की संस्कृति पर ही आघात किया जाने लगा। सब्सिडी कम होने लगी और लगभग बंद हो गयी, एमएसपी हतोत्साहित की जाने लगी, जमाखोरी को रोकने के लिये लागू कानून आवश्यक वस्तु अधिनियम, पहले, व्यापारी संगठनों के दबाव में हतोत्साहित किया गया और अब तो वह कानून ही रद्द कर दिया गया। इसी बीच उद्योग लॉबी का दबाव बढ़ा तो कृषि उपेक्षित होती चली गयी और धीरे-धीरे ‘उत्तम खेती’ एक अलाभकर कार्य बन कर रह गया, जिसके कारण, ग्रामीण आबादी का शहरों की तरफ पलायन हुआ और कृषि संस्कृति के पराभव काल की शुरुआत हुई।

सरकार को जहां इन सब विसंगतियों के खिलाफ, किसान और खेती के बारे में सोचना चाहिए था, तो सरकार ने तीन ऐसे कृषि कानून ला दिए जो न केवल कृषि और किसान विरोधी हैं, बल्कि उनका विपरीत असर भी खेती किसानी पर, साफ-साफ दिखने लगा है।

पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (People’s Archive of Rural India) के संस्थापक पी. साईनाथ ने अपने एक भाषण में कहा है कि,

कृषि संकट अब सिर्फ किसानों और खेतिहर मजदूरों का ही संकट नहीं है बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और मानव सभ्यता का संकट है। मार्च 2018 में मुंबई में हुए किसान आंदोलन का जिस तरह से समाज के मध्यवर्ग के लोगों का समर्थन मिला, वह विश्व की अनोखी घटना थी। मध्यवर्ग को लगा किसान की समस्या उनकी खुद की समस्या है। किसानों का मुद्दा अब क्षेत्र विशेष नहीं बल्कि देश का मुद्दा बन गया है।”

Farming is now a risky business.

पी साईनाथ ने, किसान और खेतिहर मजदूरों के मसले पर भारतीय संसद के 21 दिन का विशेष सत्र बुलाने की मांग के समर्थन में डेढ़ वर्ष पूर्व आयोजित एक सेमिनार में यह बात कही थी। उन्होंने कहा था कि,

“देश में पिछले दो दशकों में 20 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। जहां कृषि संकट दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा हो, वहां किसानों का मुद्दा सिर्फ उनका ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के संकट का मुद्दा बन गया है। यह एक ऐसा संकट है, जिसके प्रभाव से मध्यवर्ग भी अछूता नहीं रह सकता है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 1999 से 2011 के बीच किसानों की संख्या में तकरीबन 1.50 करोड़ की कमी आई है। इस दौरान मजदूरी और वेतन, दोनों में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन खेती से होने वाली आमदनी में कोई बदलाव नहीं आया है। 94 फीसदी किसान आय सुरक्षा के योजनाओं के दायरे में नहीं आते हैं। खेती से होने वाली आमदनी में भारी कमी आई है। खेती अब जोखिम वाला व्यवसाय हो गई है।”

किसान, कामगार, श्रमिक, छोटे औऱ मझोले व्यापारी, सरकारी सेवक, नौकरी की तलाश में भटक रहे युवा, नोटबंदी, जीएसटी, और लॉक डाउन कुप्रबंधन से पीड़ित लोग, आज निराश हैं, आक्रोशित हैं, और उद्वेलित भी है। समस्या इनकी समस्याओं के समाधान ढूंढने की तो है ही, पर सबसे बड़ी समस्या आज है, सत्ता की ज़िद, अहंकार, हठधर्मिता, और मनमानापन। किसान लम्बे समय से आंदोलित हैं। पर वे चाहते क्या हैं, यह न तो सरकार पूछ रही है और न ही सरकार का कोई जिम्मेदार व्यक्ति पूछने जा रहा है।

किसानों का दिल्ली चलो आंदोलन रोकने के लिये सरकार ने व्यापक इंतजाम किए हैं, पर इस बात की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है कि किसान संगठनों के साथ उनकी समस्याओं के बारे में सरकार उन्हें समझाये और उनकी शंकाओं का निवारण करने की कोशिश करे। पूंजीपतियों की ज़रा सी समस्या पर सरकार, बैंकों के खजाने और तमाम राहत के रास्ते खोल देती है, पर कभी भी सरकार ने यह चिंता नहीं कि, कृषि कानूनों पर किसानों से, श्रम कानूनों पर श्रमिक संगठनों से, जीएसटी की जटिलता और समस्याओं पर छोटे और मझोले व्यापारियों के संगठनों से बातचीत का सिलसिला शुरू करे और उनकी समस्याओं का समाधान करे। इसका सबसे बड़ा कारण है कि सरकार उस अफीम के डोज पर भरोसा करती है, जो लम्बे समय तक लोगों को धर्म, जाति, सम्प्रदाय और पंथ के नशे में मदहोश रख सकती है। जब तक अफीम की इस पिनक से समाज नहीं उबरेगा, सत्ता चाहे किसी भी दल की हो वह मगरूर, ठस, और संवेदना से शून्य बनी रहेगी। अब देखना यह है कि क्या किसानों का 26 नवम्बर 2020 का दिल्ली चलो आंदोलन, क्या देश मे व्याप्त जड़ता को झिंझोड़ कर, बदलाव की एक नयी इबारत लिख पायेगा ?

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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