लॉकडाउन में रोज संघर्ष करती महिलाएं

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Women struggling daily in lockdown

नई दिल्ली से डॉ. अशोक कुमारी । लॉकडाउन (Lockdown) में सरकार प्रचारित कर रही है कि घर में रहें और सुरक्षित रहें, सरकारी प्रचार में भी यही दिखाते हैं कि आप अपने शौक के काम करें, चाहे वो कुकिंग हो या पेटिंग।

भारत का एक वर्ग सरकार के कहे अनुसार अपने शौकिया वीडियो सोशल मीडिया पर डाल कर सभ्य नागरिक होने का सबूत (Proof of being civilized) भी दे रहा है। ऐसा वर्ग, जिसे मिडिल क्लास भी कहा जा सकता है, उनके पास पर्याप्त सेविंग है वो लोग मार्केट से एडवांस राशन भरवा कर रख सकते हैं, उनके ऑफिस से सेलेरी आ सकती है, लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो अगर घर में बैठ गए तो वे अपना और अपने बच्चों का पेट भी नहीं भर सकते। इसलिए दो वक्त के खाने के जुगाड़ के लिए आज उन्हें घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। भले ही सरकार इनके लिए नीतियां बना देती है, लेकिन इन नीतियों का लाभ लेने के लिए सारा सारा दिन इन्हें लाइन में लगना पड़ रहा है। उस पर भी कुछ लोगों तक ही फायदा पहुंच रहा है।

इसी तरह जब यह लेकिका प्रेम नगर के प्राइवेट स्कूल में खाना बंटने की स्थिति को देखने गई, तो वहां तीन छरहरी काया वाली महिलायें पुलिस वाले से बहस कर रही थीं कि हमारे घर में चार बच्चे हैं और हम मियां बीवी दो लोग अलग और आप ने चार पूरियां दी हैं, क्या एक-एक पूरी में सबका पेट भर जायेगा?

पुलिस वाला उन्हें आगे बढ़ने और भीड़ न बढ़ाने की हिदायत दे रहा था।

जब इन महिलाओं से मैने पूछा कि क्या हुआ, तो वो बताने लगी कि घर में राशन नहीं, है यहां दो घंटे लाइन में लगने के बाद चार पूरियां और थोड़ा सा सब्जी दिया है। इन में से एक महिला श्वेता के घर हम सभी महिलायें पहुंच गईं और उनसे बात की।

प्राईवेट फैक्टरी में जूते की बाइंडिंग का काम करने वाली श्वेता का काम भी अन्य मजदूरों की तरह छूट गया है। मार्च की सेलेरी भी उसे नहीं मिल पाई है। अब घर में भोजन का सहारा केवल स्कूल से मिलने वाला खाना ही है। घंटों लाइन में लगने के बाद उसे दो पैकेट खाना ही मिल पाता है, जबकि घर में सास और चार बच्चों के साथ वह छ सदस्य हैं। श्वेता की उम्र अभी पैंतीस साल है और उसकी पहली बेटी सोलह साल की, दूसरी बेटी चौदह साल की बेटा बारह साल का तथा सबसे छोटी बेटी दस साल ही है। 2016 में उसके पति के कैंसर हो जाने से उनकी मृत्यु हो गई। इससे पहले उनके पति इंद्रलोक में बिग बाजार में काम करते थे।

श्वेता की बहन ने उन्हें समझाया था कि ‘‘जब आप लोगों का गांव में खेती-बाड़ी नहीं है तो शहर में ही आकर रहो’ उसके बाद वे दस साल पहले शहर में आकर रहने पति और सास के साथ रहने लगी थी।

श्वेता करीब छ साल से एक ही मकान में रह रही है, जिसका 1500 रुपया किराया देती है, मकान काफी अन्दर तक धंस गया है। ऐसा लगता है कि कभी भी गिर सकता है। इस बात को वह भी महसूस करती है, लेकिन यहां रहने के अलावा उसके पास कोई और विकल्प नहीं है क्योकि और जगह किराया ज्यादा देना पड़ सकता है।

श्वेता बताती है कि सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन अचानक से इनकी तबीयत खराब हो गई और पता चला कि इनको कैंसर है। ईएसआई में इलाज करवाया, लेकिन बच नही पाये। हम तो पढ़े-लिखे भी नहीं हैं, समझ नहीं पाये क्या करें फिर हमें किसी ने टिकरी बार्डर फैक्टरी में काम के बारे में बताया, वहां हमने काम करना शुरु किया अब हमारी सेलेरी नौ हजार रुपये हो गई थी’’।

श्वेता का मायका बिहार के सेपुरा में है और ससुराल पटना के बख्तियारपुर में है। ससुराल में इनके पति अपनी मां के अकेले बेटे थे, इनके पास खेती बाड़ी नहीं थी। जब श्वेता के पति चार साल के थे तभी उनकी मां विधवा हो गई थी। उन्होंने भी बड़ी मुश्किल से बेटे को पाला और इस काबिल बनाया कि वो कमा खा सके।

श्वेता कहती है कि

‘‘यहां बहुत से लोगों के रिश्तेदार उन्हें गांव बुला रहे हैं, लेकिन हम तो गांव भी नहीं जा सकते, क्योंकि हमारा तो गांव में भी कुछ नहीं है।“

भारतीय समाज में लड़कियों को एक बोझ व जिम्मेदारी की तरह देखा जाता है, यही कारण है कि स्कूल जाने की उम्र (चौदह साल) में श्वेता की शादी में हो गई थी और जिस उम्र में लड़कियां अपने कैरियर को सजाने संवारने का काम करती हैं, उस उम्र में वह (उन्नीस साल) में वह एक बच्चे की मां बन गई थी।

श्वेता कहती है कि

‘‘आज कल कुछ लोग तीस साल की उम्र में शादी करते हैं लेकिन मैं तीस साल की उम्र में चार बच्चों की मां बन गई थी, मैं अपनी बेटियों के साथ ऐसा नही करुंगी उन्हें खूब पढ़ाऊंगी’’।

बड़ी बेटी बारहवी कक्षा में और दूसरी बेटी दसवी में पढ़ रही है। श्वेता बताती है कि

‘‘उसे गांव और रिश्तेदारों ने दूसरी शादी की सलाह दी, लेकिन उसने मना कर दिया क्यों,कि इसका बुरा प्रभाव बच्चों पर पड़ सकता है दूसरा कोई भी उसे स्वीकार कर लेगा लेकिन उसके बच्चों को नहीं,।’’

वो कहती है कि

‘‘भगवान ने इतने सारे स्वाद दिये हैं दुनिया, को मैं सोचूंगी कि एक स्वाद नहीं लिया तो मर नहीं जाऊंगी, बल्कि इससे मेरे बच्चों का भला ही होगा, इसलिए दूसरी शादी का प्रस्ताव आने पर भी मैं सपने में भी इसके बारे में नही सोचती हूं’’।

लॉकडाउन होने के कारण मजदूरों को होने वाली परेशानियां | Workers suffer due to lockdown

लॉकडाउन होने के कारण और मजदूरों की तरह श्वेता भी परेशान है पहले लॉकडाउन के समय कुछ समाजसेवी संस्था के द्वारा उन्हें कुछ दिनों के लिए राशन मिल गया था, उसके साथ ही दिल्ली सरकार द्वारा जारी ई-कूपन बनने की वजह से उन्हें सही समय पर राशन प्राप्त हो गया, जिससे कुछ हद तक राहत मिल गई, मकान मालिक ने अभी उनसे किराया नहीं लिया है, लेकिन वह डर रही है कि अगली बार कहीं मकान मालिक उनसे किराया न मांग ले। अब उन पर गुजारा करने के लिए राशन तो है लेकिन नगद पैसा नहीं है।

वो बताती है कि

‘‘मेरे बच्चों को मैंने गरीबी क्या है इसका अहसास नहीं होने दिया कभी, लेकिन आज कल बच्चे डिश (व्यंजन) की फरमाइश करते हैं, मैं उन्हें कैसे बताऊं कि व्यंजन बनाने के लिए तेल मसाला चाहिए, जो कि हमारे पास सीमित है। अगर अभी से हमने तेल मसाला खत्म कर दिया तो दाल और सब्जी में क्या डालेंगे केवल आटा और चावल को बना कर नहीं खाया जा सकता?’’

Women bear the brunt of humanitarian disasters, including COVID-19

जिस समय मिडिल क्लास अपनी होबीज (शौक) के गाने, डांस, मस्ती, कुकिंग की विडियो और फोटो डालने मे व्यस्त है वहीं श्वेता जैसी महिलाएं चार किलामीटर पैदल चल कर रोजी-रोटी के जुगाड़ मे लगी हुई थीं।

श्वेता अपने घर में अकेली है इसलिए बाहर के सभी काम उसे ही करने पड़ते हैं। ई-कूपन बनने के बाद वह निठारी सेन्टर पर राशन लेने पहुंची, जो कि उसके घर से चार किलोमीटर दूर था और लॉकडाउन के कारण आने जाने के लिए कोई ऑटो भी नहीं मिल पाता। वह तक पैदल ही गई राशन सेन्टर पर, ज्यादा भीड़ के कारण लोगो में लड़ाई हो गई जिससे पुलिस वहां से दो लोगों को पकड़कर एक कोने में ले जाकर हाथ ऊपर करवाकर इतना मारा कि वो लाल पड़ गए। इस दृश्य को देख कर वो सहम गई थी, श्वेता कहती है कि

‘‘उनकी ऐसी हालत देख कर मन किया की भाग जाऊं, लेकिन क्या करुं इतना मुश्किल से तो कूपन बना, राशन तो लेकर जाना ही था, सुबह नौ से लेकर तीन बज गए लेकिन खुशी इस बात की है कि राशन मिल गया।’’

जैसे जैसे लॉकडाउन का समय बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे श्वेता जैसे परिवारों की समस्या भी बढ़ती जा रही है। स्कूलों में बंटने वाला पके हुए खाने की मात्रा उतनी ही है जितनी पहले लॉकडाउन के समय थी, लेकिन खाना लेने वालों की लाइन बढ़ती जा रही है।

महिलाएं बताती हैं कि ‘‘शाम को मिलने वाले खाने के पैकेट में पहले इतना मिलता था कि दो बच्चे एक साथ खा सकें लेकिन अब उस पैकेट का आकार छोटा हो गया है। अब तो बच्चो का पेट भी नहीं भर पाता है। कई बार चावल कच्चे हो जाते हैं, जिसे खाने से और भी पेट खराब हो सकता है’’।

बहुत से लोगों ने बताया कि उन्हें ई-कूपन अप्लाई किए एक महीने हो गए, लेकिन अभी तक कोई मैसेज नहीं आया।

प्रेम नगर एफ ब्लाक की औरतें इसके संबंध में इकट्ठा होकर विधायक से मिलने गईं। विधायक ने केवल आश्वासन दिया कि हो जायेगा। एक बार विधायक मोहल्ले में आकर कह गया कि कोई भी दुकानदार ई-कूपन भरने का पैसा न ले लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कई लोग पचास रुपये तक ले रहे हैं और नाम भी नहीं आ पा रहा है।

गौरतलब है कि सरकार कागज पर नीतियां तो बना देती है लेकिन कभी भी धरातल पर उतर नहीं देखती कि वो नीतियां कहां तक व्यावहारिक हो पाई हैं?

 

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