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Women's Health

स्त्रियों की सेहत, शरीर और सेक्सुअलिटी और इंटरनेट : एक लुप्त कड़ी

Women’s health, body and sexuality and the Internet: a missing link

आ गया है महिला दिवस – पर महिलाएं हैं कहाँ?

नई दिल्ली, 04 मार्च 2021. वर्ष 2020 ने दुनिया को डिजिटल की तरफ़ बढ़ते हुए देखा – काम के लिए, शिक्षा के लिए और मनोरंजन के लिए भी। व्यक्ति और संस्थाएं काम करने, सीखने-पढ़ने और संलग्न रहने के लिए ऑनलाइन ज़रियों की तरफ अग्रसर होने लगे। फिर भी, ऑनलाइन प्लेटफार्म की तरफ बढ़ते कदम, हर किसी के लिए एक जैसे नहीं रहे और उसके फायदे भी असमान रूप में मिले। इंटरनेट तक पहुँचने में आर्थिक, लैंगिक, शहरी-ग्रामीण विभाजन का सीधा असर पड़ता है, यह सूचना, संसाधनों और उपयुक्त मौक़ों की उपलब्धता को भी प्रभावित करता है।

स्त्रियों की इंटरनेट तक पहुँच पुरुषों के मुक़ाबले कम

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (The National Family Health Survey – एनएचएफएस ) में अच्छी तरह से इस बात को दिखाया गया है कि स्त्रियों की इंटरनेट तक पहुँच पुरुषों के मुक़ाबले कितनी कम है। हालाँकि , पिछले दशक में कुछ सुधार हुआ है फिर भी स्त्री और पुरुषों के सूचकांक में बड़ा अंतर है।

एनएचएफएस की 2019-2020 की रिपोर्ट के अनुसार औसतन केवल 42.6 प्रतिशत स्त्रियों ने भारत में इंटरनेट का प्रयोग किया है जबकि पुरुषों में यह औसत 62.6 प्रतिशत था। यह अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में और भी कम है, कुछ प्रदेशों यह औसत 25 प्रतिशत से भी कम है, जैसे बिहार (20.6 प्रतिशत ), आंध्र प्रदेश (21 प्रतिशत ) और त्रिपुरा (22.9 प्रतिशत )।

ये आंकड़े सिर्फ उन लोगों के बार में जानकारी देते हैं जिन्होंने इंटरनेट का कभी भी इस्तेमाल किया हो मगर यह नहीं बताते कि इंटरनेट उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है या नहीं। तो यदि औसतन 42.6 प्रतिशत स्त्रियों ने भी इंटरनेट का उपयोग किया भी है तो यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट के सार्थक प्रयोग (Meaningful use of the internet – जानकारी, संसाधन और अवसरों की उपलब्धता की तफ़तीश) के असल आंकड़े बेहद कम हैं।

इससे भी अधिक समस्या यह है कि जब बात स्त्री की सेहत, शरीर और सेक्सुएलिटी की हो, तब स्त्रियों की ऑनलाइन या ऑफलाइन बातचीत में भागीदारी लगभग ना के बराबर होती है। आम बातचीत में ही नहीं बल्कि मीडिया, शिक्षा पाठ्यक्रम और सार्वजनिक चर्चाओं में भी इन विषयों को अनदेखा कर दिया जाता है।

यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य एवं अधिकार को लेकर काम करने वाली संस्था लव मैटर्स इंडिया का अपना अनुभव भी मिलता जुलता ही है। लव मैटर्स इंडिया के मुताबिक काफी स्त्रियां स्वयं के विषय में,अपने शरीर, स्वास्थ्य और सेक्सुएलिटी के विषय में बातचीत में भागीदार नहीं बनती हैं।

लव मैटर्स के जस्ट पूछो फोरम (यौन स्वास्थ्य और संबंधों पर लव मैटर्स जी सवाल-जवाब सेवा ) के आंतरिक सदस्यों द्वारा एकत्रित छह माह की अवधि के आंकड़ों (1 सितम्बर 2020 से 28 फरवरी 2021 ) से यह पता चलता है कि इस फॉरम पर पूछे गए प्रश्न और चर्चा में 91 प्रतिशत से भी ज़्यादा भागीदारी पुरुषों द्वारा की गयी थी।

इसके अतिरिक्त, पिछले दस वर्षों में, संस्था ने यह गौर किया है कि अक्सर स्त्री के शरीर, गर्भनिरोधक और प्रजनन चयन अकसर पुरुषों द्वारा पूछे जाते हैं।

संस्था ने कहा है कि पिछले छह माह के एकत्रित हमारे मंच के आंकड़ों में, सभी चर्चाओं में से कम से कम 30 प्रतिशत स्त्री के स्वास्थ्य के विषय में थीं परन्तु पुरुषों द्वारा उठायी गयी थीं।

महिलाओं की लव मैटर्स इंडिया की वेबसाइट और सोशल मीडिया पर उपस्थिति भी लगभग ऐसी ही कहानी सुनाती है।

आंकड़ों के हिसाब से लव मैटर्स इंडिया की वेबसाइट पर लगभग 10 मिलियन उपभोक्ताओं और फेसबुक पेज के 1.4 मिलियन उपभोक्ताओं में स्त्रियों की संख्या मात्र 25 प्रतिशत है।

संस्था ने कहा है कि एक और रोचक आंकड़ा जो हमें प्राप्त हुआ उसके अनुसार लव मैटर्स इंडिया के कॉन्टेंट को केवल 17% महिलाएं ब्राउज़ कर रही थीं जबकि 83% पाठक पुरुष थे।

आखिर क्यों ? ऐसा क्या है जो महिलाओं को उनके स्वास्थ्य, शरीर या सेक्सुएलिटी/यौनिकता से जुड़ी ऑनलाइन चर्चा में शामिल होने से रोकता है ?

प्रतिष्ठित सामाजिक वैज्ञानिक और कार्यकर्ता कमला भसीन कहती हैं ,”हाँ, यौनिकता को लेकर औरतों की समस्याएँ और सवाल मर्दों की तुलना में सच में बहुत अधिक हैं। पर हम बोलते नहीं हैं… हम बात नहीं करते है। हमारी चुप्पी और हमारे डर ने हमें आगे बढ़ने से रोक दिया है। इन दोनों से लड़े बिना, औरतों के लिए आगे बढ़ना, ऑनलाइन हो या ऑफ़लाइन, बेहद मुश्क़िल है।”

विख्यात जेंडर राइट्स अडवोकेट और लव मैटर्स इंडिया की प्रमुख विथिका यादव के अनुसार,

“दरअसल, शर्म और सामाजिक वर्जना स्त्रियों के स्वास्थ्य और यौनिकता से जुड़े हुए हैं जो अक्सर यह सवाल खड़ा कर देता है कि इस मसले पर बात होनी चाहिए या नहीं, यह सब स्त्रियों को इन चर्चाओं को ऑनलाइन अथवा ऑफलाइन शुरू करने के क्रम में प्रभावित करता है। अंततः जैसा कि एनएचएफएस के आंकड़ों से भी पता चलता है स्त्रियों की इंटरनेट तक पहुँच बेहद कम है।

बहुत सी युवा स्त्रियों ने इन अनुभवों की पुष्टि लव मैटर्स इंडिया के साथ हुई बातचीत में की।

दिल्ली में रहने वाली 21 साल की मैनेजमेंट प्रोफेशनल अर्चना ने कहा,

“ऐसी कई घटनायें हुई हैं जब मुझे मेरी बातों के लिए शर्मिंदा किया गया। स्त्रियों को अपनी सेक्सुएलिटी, अपने शरीर, अपने चरित्र, अपनी मूल सुरक्षा के प्रति तीखी प्रतिक्रिया और खतरे का सामना करना पड़ता है।”

दिल्ली में रहने वाली तेईस साल की सामाजिक कार्यकर्ता अनु का कहना है,

“मुझे लगता है कि एक स्त्री होना इस बात को निश्चित ही प्रभावित करता है कि मैं सोशल मीडिया पर क्या शेयर करती हूँ। उदाहरण के लिए, मैं अपने राजनीतिक विचारों को अपने इंस्टाग्राम में शेयर कर रही थी… और मेरे इंस्टाग्राम पर बहुत से ऐसे लोग थे जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती और उन्हें लगा कि मेरे इनबॉक्स में आकर कुछ भी अनुचित लिखना एकदम ठीक है। उस पल मैं कार्यकर्ता नहीं थी, मैं किसी भी विचार के साथ नहीं थी, मैं बस एक स्त्री थी जिसके साथ जैसे चाहे वैसे बोला जा सकता है। इसलिए, मुझे ऐसा लगता है कि स्त्री होना निश्चित ही मेरे सोशल मीडिया के मंच पर कॉन्टेंट शेयर करने के तरीके को प्रभावित करता है।”

बिहार की 19-वर्षीया निशा कुमारी कहती हैं,

“मुझे डर है कि यदि मैं किसी ऑनलाइन चर्चित विषय पर कमेंट करूंगी तो बहुत से लोग मेरा प्रोफाइल देख लेंगे। और ऐसे बहुत से छिछोरे और उपद्रवी लोग ऑनलाइन होते हैं जो बेकार के कमैंट्स आपकी वॉल पर पोस्ट करते रहते हैं। यदि आप जवाब नहीं देते, तो वे बार बार आपको मैसेज करके आपको परेशान करते हैं।”

स्त्रियों की स्वतंत्रता से ऑनलाइन जानकारी तक पहुँच ना पाने के विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए, लव मैटर्स की क्रिएटिव डायरेक्टर आरती शुक्ला कहती हैं,

“इसकी वजह से औरतें असुरक्षित और असहज महसूस करने लगती हैं और प्रभाव यह पड़ता है कि उनकी जानकारी कम रह जाती है। जिसकी वजह से अपने शरीर, स्वास्थ्य और यौनिकता पर उनका नियंत्रण बहुत कम हो जाता है। हालांकि हमें इस बात की ख़ुशी है कि पुरुष हमारे मंच पर प्रश्न पूछते हैं, यह ज़्यादा अच्छा होगा कि स्त्रियां सीधे प्रश्न करें और प्राप्त जानकारी का उपयोग वे वैसे निर्णय लेने में करें जो उनके हित में हो ना कि उस व्यक्ति के जो उनके और जानकारी के स्रोत के बीच मध्यस्थता कर रहा हो।”

तो ऑनलाइन स्पेस को स्त्री की जद में कैसे लाया जाये?

जिन स्त्रियों से लव मैटर्स इंडिया ने बात की, उनके पास उनके अपने अनुभवों पर आधारित कई सहायक सुझाव हैं। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा सम्मिलित रूप से अधिक प्रभावी कानून, ऑनलाइन सामाजिक योग्यता बढ़ाने पर ज़ोर और सोशल मीडिया के मंचों द्वारा बेहतर नियंत्रण आदि शामिल हैं ।

नेहा, 21, जयपुर से पत्रकारिता की एक छात्रा, कहती हैं,

“लोगों को इस बात से अवगत कराया जाना चाहिए कि वे ऑनलाइन स्पेस में किस तरह का आचरण करें। ऑनलाइन स्पेस में सहमति का भी महत्व है।”

वे आगे जोड़ते हुए कहती हैं,

“सामाजिक मंच पर सूचनाओं की प्रक्रिया को निर्धारित करने की आवश्यकता है। अक्सर सोशल मीडिया पर अगर आप अपमानजनक व्यवहार की रिपोर्ट करते हैं तो आपको उत्तर मिलता है कि यह कमेंट कम्युनिटी के दिशा निर्देश पर खरा उतरता है!”

अठारह साल की ईशा, चंडीगढ़ की भाषा विज्ञान की छात्रा हैं। उनकी एक मददपूर्ण सलाह स्त्रियों के लिए है कि “आपको अनदेखा करने की कला आनी चाहिए और आपको मज़बूत रहना चाहिए।”

‘यकीनन!’ भसीन भी अपने अंदाज़ में कहती हैं,

“बिना बोले कुछ नहीं होने वाला। हमारा वो गाना नहीं सुना? तुम बोलोगी, मुँह खोलोगी, तभी तो ज़माना बदलेगा! या वो दूसरा वाला, इरादे कर बुलंद तू रहना शुरू करती, तो अच्छा था, तू सहना छोड़, कहना शुरू करती, तो अच्छा था। तो दोस्तों, इन सब मुद्दों पर अपने दिल की बातें कहो। गांठें खुलेंगी बातें करने से, जिंदगी बनेगी बातें करने से। डर छोड़ों, एक ही ज़िन्दगी हैं। इसको अच्छे से जीना है। और जीना है बोल के, जीना है सोच, के और जीना है सबके साथ मिल के।”

यादव इस कड़ी में जोड़ते हुए कहती हैं,

“यह बेहद ज़रूरी कि हम स्त्रियों के लिए सकारात्मक और प्रभावी का ऑनलाइन स्पेस का निर्माण करें ताकि वे सहजता से उन जगहों का इस्तेमाल कर सकें, अपनी बात रख सकें। इसके पीछे मूल विचार स्त्रियों में उस सक्षमता का विकास करना है जिससे वे डिजिटल वर्ल्ड में अपने लिए ज़रूरी विषयों के बारे में खुलकर बात कर सकें।”

इस प्रक्रिया को रूप देने के लिए लव मैटर्स अपना पहला ट्वीटएथेन शुरू करने वाले हैं, जिसमें बड़े पैमाने पर स्त्रियों की सार्वजानिक उपस्थिति, क्या है जो इसे रोकता है और वे क्या कदम हैं जो कि स्त्री की ऑनलाइन उपस्थिति को बढ़ावा देने के लिए बढ़ाये जा सकते हैं, खासतौर से उनके शरीर, स्वास्थ्य और सेक्सुएलिटी के सम्बन्ध में, बातचीत की जाएगी। उम्मीद है कि इस चर्चा से अलग-अलग तरह के मंतव्य और सलाह मिलेंगे कि किस तरह स्त्रियों की इंटरनेट पर पहुँच बेहतर की जा सकती है और किस तरह उनकी अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के उन्हें सक्षम किया जा सकता है।

यह जानकारी एक विज्ञप्ति में दी गई है।

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

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