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चिंताजनक है पिछले सात सालों में सुरक्षा बलों में बढ़ती हुई आत्महत्या की प्रवृत्ति

There is a worrying trend of increasing suicide among security forces in the last seven years: Vijay Shankar Singh (retd. Senior IPS officer)

सुरक्षा बलों में मानसिक स्वास्थ्य | Mental health in the security forces

जैसे-जैसे घृणा और जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र से जुड़ी कट्टर घटनाएं बढ़ने लगती हैं तो उसका सीधा असर पुलिस और सुरक्षा बलों पर पड़ता है। पुलिस और सुरक्षा बलों को लम्बे समय तक ऐसी जटिल परिस्थितियों में काम करने के कारण, उन्हें लगातार मानसिक और शारीरिक दबाव में रहना पड़ता है। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। स्वास्थ्य से मेरा आशय केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी है। शरीर हो सकता है अतिरिक्त और लगातार श्रम झेल भी ले, पर मन अक्सर यहां विचलित हो जाता है और कभी-कभी ऐसी दारुण मानसिक स्थिति का अंत आत्महत्या में भी होने जाता है। हालांकि सभी सुरक्षा बलों में स्वास्थ्य (Health in the security forces) को प्राथमिकता दी गयी है। नियमित शरीरिक जांच के साथ मन की उद्विग्नता को नियंत्रित करने के लिये घर परिवार से नियमित सम्पर्क हेतु, अनेक उपाय किये गए हैं, पर सुरक्षा बलों में आत्महत्या की खबरें (News of suicide in defense forces) अब भी कम नहीं हो रही हैं।

चौंकाने वाले हैं सेना में आत्महत्या के आंकड़े | The suicide statistics in the army are shocking

अगर केवल सेना के ही संदर्भ में, आत्महत्या के आंकड़ों की बात करें तो, पिछले सात सालों में सेना, नौसेना और भारतीय वायुसेना के लगभग 800 कर्मियों ने आत्महत्या की जबकि “फ्रेट्रिसाइड” के 20 मामले सामने आए हैं। हमारी सेना की कुल जनशक्ति 14 लाख है, और प्रतिशत तथा सांख्यिकी के दृष्टिकोण से, यह संख्या नगण्य लग सकती है, फिर भी जवानों की इस प्रकार की खुदकुशी तकलीफदेह है।

Better measures to prevent suicide in the armed forces

इन आंकड़ों को देखते हुए सशस्त्र बलों में आत्महत्या रोकथाम के बेहतर उपाय और तनाव प्रबंधन नीतियों की आवश्यकता है।

रक्षा राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में बताया है कि इंडियन एयरफोर्स में 160 और नौसेना में 36 जवानों ने खुदकुशी की है। हालांकि, रक्षा राज्य मंत्री ने यह भी कहा है, कि

“सशस्त्र बलों ने सैनिकों के तनाव प्रबंधन के उपाय किए हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है।”

आत्महत्याओं के बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 100 वर्दीधारी कर्मचारी हर साल आत्महत्या कर रहे हैं, और यह आंकड़ा पिछले कई सालों का है। इसका कारण है, पाकिस्तान और चीन की सीमाओं के साथ-साथ आतंकवाद रोधी अभियानों में तैनाती।

जटिल पोस्टों पर सैनिकों की तैनाती उनके मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य को काफी प्रभावित करती है। वहीं दूर-दराज के इलाकों में तैनात सैनिकों को परिवार द्वारा उठाई जा रही मुसीबत के समय घर वापसी न कर पाने के कारण, जवान अक्सर, भारी तनाव से गुजरते रहते हैं, जिनमें वित्तीय और वैवाहिक समस्याओं से लेकर संपत्ति विवाद और असामाजिक तत्वों द्वारा उत्पीड़न तक के काऱण शामिल हैं।

सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2011 से 2018 के बीच भारतीय सैन्य बलों (थल, वायु और नौसेना) के 891 जवानों की मौत आत्महत्या के कारण हुई। इस दौरान सबसे अधिक, 707 जवानों ने थलसेना में आत्महत्या की. वायुसेना में यह संख्या करीब पांच गुना कम रही जिसके 148 जवानों ने इस दौरान आत्महत्या को गले लगाया. नौसेना में सबसे कम, 36 जवानों ने आत्महत्या की। साल 2011 में थलसेना में आत्महत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई जहां 105 जवानों की आत्महत्या के मामले सामने आए. इसके बाद सबसे अधिक, 104 जवानों ने साल 2016 में आत्महत्या की. वहीं थलसेना में पिछले साल आत्महत्या के 80 मामले सामने आए थे। इस तरह से तीनों सेनाओं में हर साल जवानों की आत्महत्या का औसत 111 है. थलसेना में सालाना यह औसत 88 है जबकि वायुसेना में 18.5 और नौसेना में 4.5 है।

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साल 2011 से 2018 के बीच भारतीय सशस्त्र बलों (सेना, वायु सेना, नौसेना) के 892 कर्मियों ने आत्महत्या कर ली है. संसद में पिछले वर्षों में पूछे गए सवालों से यह आंकड़ा सामने आया है. आत्महत्या करने वालों में सेना के जवान ज्यादा हैं.

आंकड़ों के मुताबिक 2011 में 132, 2012 में 111, 2013 में 117, 2014 में 112, 2015 में 86, 2016 में 129, 2017 में 101 और 2018 में 104 मामले सामने आए. इन आठ वर्षों में आर्मी के 707, एयरफोर्स के 148 कर्मियों और नेवी के 37 कर्मियों ने सुसाइड किया है. आंकड़ों के मुताबिक साल 2011 में सेना के जवानों के सुसाइड की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ था और उस साल आत्महत्या के 105 वाकये सामने आए थे. इसी तरह साल 2016 में भी सेना में आत्महत्या से 101 मौतें हुई थीं.

पिछले तीन साल की बात करें तो साल 2016 में सैन्य कर्मियों के आत्मह्त्या के 129 मामले, 2017 में 101 मामले और 2018 में 104 मामले सामने आए. साल 2016 में आर्मी में सुसाइड के 104 मामले, नेवी में 6 मामले और एयरफोर्स में 19 मामले सामने आए. इसी तरह 2017 में आर्मी में सुसाइड के 75, नेवी में 5 और एयरफोर्स में 21 मामले सामने आए. साल 2018 में आर्मी में सुसाइड के 80, नेवी में 8 और एयरफोर्स में 16 मामले सामने आए.

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यही नहीं, मानसिक परेशानी और हताशा की वजह से सैन्य कर्मियों के अपने साथी सैनिकों या परिजनों पर गोलीबारी के भी बहुत सारे वाकए सामने आए हैं। साल 2016 में ऐसे 3 मामले, 2017 में ऐसा एक मामला और 2018 में एक मामला सामने आया है। आर्मी यानी थल सेना में हर साल आत्महत्या से औसतन 88 मौतें, एयर फोर्स में 18.5 मौतें और नेवी में 4.5 मौतें हुईं हैं ।

सरकार ने तनाव प्रबन्धन पर राज्यसभा में ही कहा है कि,

“सैनिकों की आवाजाही की सुविधा और एक शिकायत तंत्र स्थापित करना शामिल है। कमांडरों द्वारा विभिन्न स्तरों पर तनाव और तनाव के मुद्दों से व्यापक तरीके से निपटा जा रहा है। सेना में बहुस्तरीय रणनीति के हिस्से के रूप में विशिष्ट उपाय किए गए हैं, जिसमें स्ट्रेस मैनेजमेंट सेशन साइकाइट्रिक काउंसलिंग, और इस विषय पर कमांडरों की संवेदनशीलता शामिल है।”

आत्महत्या के मामलो को, रोकने के उपायों पर चर्चा करते हुए सरकार ने कहा कि,

” सरकार, कपड़ा, खाना, यात्रा और मनोरंजन जैसी बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराती है और साथ ही वह शादीशुदा दंपत्ति के रहने के लिए आवास और बच्चों के लिए स्कूल की भी व्यवस्था भी करती है। कपड़ों, खाने-पीने, परिवार के साथ रहने, यात्रा सुविधा, स्कूल, मनोरंजन, योगा, मेडिटेशन, स्ट्रेस मैनेजमेंट आदि के मामले में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है. यही नहीं, सेना के उत्तरी और पूर्वी कमांड में जवानों के तनाव को कम करने के लिए ‘मिलाप’ और ‘सहयोग’ जैसे प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। सरकार ने छुट्टी की नीति को उदार बनाने के साथ समस्याओं के निपटारे का भी तंत्र स्थापित किया है। मुंबई के नौसेना अस्पताल आईएनएचएस अश्विनी में एक सैन्य मनोरोग चिकित्सा केंद्र की स्थापना की गई है. इसके साथ ही मुंबई, गोवा, कोच्चि, विजाग, पोर्ट ब्लेयर और करवार में अन्य मानसिक स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं। जवानों के लिए समय-समय पर बैठकें भी होती रहती हैं. सभी यूनिटों में प्रशिक्षित काउंसलरों की तैनाती की गई है. सेना में शामिल किए जाने से पहले भी जवानों को मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूक किया जाता है. तनाव को दूर करने के लिए सभी यूनिटों में योग और मेडिटेशन की व्यवस्था की गई है।”

जवानों की प्रोफेशनल तरीके से काउंसलिंग करने के लिए सेना और वायु सेना ने एक हेल्पलाइन की शुरू की है. ऐसा नहीं कि तनाव और अन्य वजहों से आत्महत्या करने का यह मामला सिर्फ सैन्य बलों में हो।

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यह तो हुई सेना की बात। अब केंद्रीय पुलिस बल की बात करें तो यह प्रवृत्ति वहां भी कम नहीं है। तीनों सेनाओं के अलावा सरकार ने केंद्रीय सैन्य पुलिस बलों (सीएपीएफ) और असम राइफल्स में जवानों द्वारा किए गए आत्महत्या का भी आंकड़ा दिया है। सरकार द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में साल 2012-15 के बीच आत्महत्या के सबसे अधिक मामले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में देखे गए जहां 149 जवानों ने आत्महत्या की. इसी दौरान, सीमा सुरक्षा बल के 134 जवानों ने अपनी जान ले ली।

इन चार सालों में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के 56 जवानों ने आत्महत्या की जबकि भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के 25-25 जवानों ने आत्महत्या की. इसी दौरान असम राइफल्स के 30 जवानों ने आत्महत्या की।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों (National Crime Records Bureau’s latest data) के अनुसार 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र पुलिस बलों के 36 जवानों ने आत्महत्या कर ली। छह साल में ऐसी कुल 433 घटनाएं हुई हैं।

आंकड़ों के अनुसार छह साल के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के 433 कर्मियों ने आत्महत्या की। वर्ष 2018 में सबसे कम 28 ऐसे मामले दर्ज किए गए जबकि 2014 में सबसे ज्यादा 175 मामले सामने आए। वर्ष 2017 में ऐसी घटनाओं की संख्या 60 थी जबकि 2016 में 74 और 2015 में 60 थी।

गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आने वाले सीएपीएफ में सात केंद्रीय सुरक्षा बल शामिल हैं. इसमें असम राइफल्स के अलावा सीमा सुरक्षा बल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बलकेंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सशस्त्र सीमा बल और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड शामिल हैं।

एनसीआरबी ने कहा कि एक जनवरी 2019 को सीएपीएफ (CAPF) में 9,23,800 कर्मी थे. ये बल सीमाओं की सुरक्षा के अलावा आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने तथा गैरकानूनी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में केंद्र और राज्य सरकारों की सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या के सबसे अधिक मामले तमिलनाडु और महाराष्ट्र से सामने आए हैं। सरकार ने इनकी समीक्षा भी की है और केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि

“आत्महत्या का कारण लंबे समय तक और लगातार तैनाती जैसी पेशेवर परेशानियां हैं।”

मंत्रालय के अनुसार,

“इसके साथ ही जवान पारिवारिक मुद्दों, घरेलू समस्याओं और शादीशुदा जिंदगी को लेकर भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे आर्थिक संकट के कारण भी तनाव में रहते हैं। आत्महत्या के अधिक मामलों का कारण जवानों का तनाव और उससे न निकल पाना है। सरकार का कहना है कि सैन्य जवानों के लिए स्वस्थ एवं अनुकूल माहौल बनाने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए हैं।”

आत्महत्या क्या है

सुसाइड या आत्महत्या, जान-बूझकर खुद की जान लेने की कोशिश का नाम है। मनोवैज्ञानिकों और आत्महत्याओं पर अध्ययन करने वाले लोगो के अनुसार, ज्यादातर लोगों की आत्महत्या के लिए कई तरह मेंटल डिसऑर्डर जैसे, डिप्रेशन, बायपोलर डिसऑर्डर, सिजोफ्रेनिया, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर, एंग्जाइटी डिसऑर्डर आदि जिम्मेदार होते हैं।

आत्महत्या के कुछ मामलों के पीछे, स्ट्रेस, आ​र्थिक समस्याओं, रिलेशनशिप की समस्याओं जैसे ब्रेकअप आदि मामले होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार,

“सुसाइड का सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिन्होंने पहले कभी खुदकुशी की कोशिश की हो।”

लोग आत्महत्या क्यों करते हैं  ? | Why do people commite suicide  ?

हर आत्महत्या दुखद होती है, लेकिन हर मामले में कुछ न कुछ रहस्य छिपा होता है। लेकिन हर आत्महत्या के पीछे एक सामान्य वजह होती है और वह है मन में निराशा की गहरी भावनाओं का घर कर जाना। कई बार लोगों को ऐसा लगता है कि वह जिंदगी और हालात से पैदा हुई चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगे या उन समस्याओं का समाधान नहीं तलाश पाएंगे। इन हालात से घबराकर लोग आत्महत्या करने को ही एकमात्र समाधान समझ लेते हैं जबकि समस्या वाकई अस्थायी होती है।

आत्महत्याओं पर की गयी एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि,

“अगर बात आंकड़ों की करें तो सबसे ज्यादा आत्महत्या की इच्छा इंसानों में 45 से 54 साल की उम्र में होती है। आत्महत्या की कोशिश करने में महिलाएं पुरुषों से आगे होती हैं। लेकिन आत्महत्या की सफलता की दर में पुरुष महिलाओं से आगे हैं।”

A lot of myths about suicide

आत्महत्या के बारे में ढेर सारे मिथक और अफवाहें हमारे समाज में मौजूद हैं। इन्हीं भ्रमों में से एक ये भी है कि किसी भी आत्महत्या की इच्छा रखने वाले शख्स से अगर इस बारे में बात की जाए तो ये उसकी इच्छा को बढ़ा देता है। अगर आपका ही कोई करीबी दोस्त या परिवार का सदस्य आत्महत्या की इच्छा जा​हिर करता है, तो यकीन मानिए उससे बातचीत करना बहुत जरूरी है। समझदारी भरा फैसला ये भी है कि उससे बात करने के लिए ठोस बातों के आधार पर चर्चा की जाए। इसके अलावा थैरेपिस्ट या सुसाइड रोकने वाली हॉटलाइन से भी बात की जाए। बातचीत को खत्म भी इस संकल्प के साथ किया जाए कि भविष्य में भी इस संबंध में वह संपर्क करते रहेंगे।

हर साल पूरी दुनिया में 8 लाख लोगों की मौत आत्महत्या के कारण होती है। इनमें से 1,35,000 लोग भारत में निवास करते हैं। भारत में साल 1987 से 2007 के बीच आत्महत्या की दर में जबरदस्त उछाल आ चुका है। पहले ये दर 7.9 प्रति 1 लाख थी, अब 10.3 प्रति 1 लाख है। भारत में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं ​दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में होती हैं। साल 2012 में तमिलनाडु से पूरे भारत में की गई आत्महत्याओं में से सबसे ज्यादा 12.5% फीसदी मामले सामने आए थे। इसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र (11.9%) और पश्चिम बंगाल (11.0%) का नंबर आता है। इसके अलावा केरल भी आत्महत्या के मामलों में पीछे नहीं है।

आत्महत्या के मामलों में महिला पुरुष का अनुपात 2:1 का है। वहीं WHO के डेटा के अनुसार, भारत में महिला और पुरुषों की आत्महत्या दर में काफी उछाल आ चुका है। भारत में प्रति 1 लाख महिलाओं में 16.4 महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं। जबकि 1 लाख पुरुषों में से 25.8 आत्महत्या करते हैं।

General information about suicide, and the reasons for suicide in the security forces

यह तो हुई आत्महत्या के बारे में सामान्य जानकारियां, पर सुरक्षा बलों में आत्महत्या की वजहें इससे अलग हैं। सुरक्षा बलों में सेना, केंद्रीय सुरक्षा बल जिंसमे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, बीएसएफ, सीआरपीएफ आदि आते हैं, और तीसरा विभिन्न राज्यो की पुलिस, जिसमे राज्यों के अपने सशस्त्र बल, जैसे उत्तर प्रदेश में पीएसी है, आते हैं। सभी बलों की ड्यूटियां और काम अलग-अलग हैं और आवश्यकता के अनुसार सबकी तैनाती होती रहती है। सुरक्षा बल एक अनुशासित बल होते हैं, और इस बल के जवान, की समस्याओं के निराकरण जिम्मेदारी बल के कमांडिंग ऑफिसर की रहती है। हालांकि सभी बलों में जवानों की पारिवारिक और सवागत समस्याओं के समाधान के लिये सरकार ने तमाम प्रबंध कर रखे हैं और उनके आवास, मैसिंग, ड्यूटी पर होने वाली दुश्वारियों के निराकरण के लिये व्यवस्था की जाती है, फिर भी इतनी अधिक संख्या में होने वाली आत्महत्यायें, न केवल दुःखद हैं, बल्कि चिंताजनक भी हैं।

सुरक्षा बल, एक परिवार की होते हैं, औऱ उसका मुखिया, उक्त परिवार के प्रमुख की तरह, उसका मुख्य दायित्व भी यह है, अनुशासन के साथ साथ जवानों की समस्याएं चाहे वे निजी हों या पारिवारिक या उनके गांव घर से जुड़ी, वे समय समय पर हल होती रहें और उनकी वजह से बल के जवानों में कोई अवसाद या स्ट्रेस आदि न पनपे।

सेना में सोल्जर कल्याण बोर्ड जैसी संस्थाए हैं, जो सैनिकों की घरेलू और रिटायरमेंट के बाद की समस्याओं को हल करने में मदद करती हैं, पर केंद्रीय पुलिस बल और राज्यों की पुलिस के जवानों के लिये ऐसी कोई संस्था नहीं है। लेकिन जवानों का कल्याण, किसी भी बल का एक प्रमुख उद्देश्य होता है, इससे न केवल सुरक्षा बलों के जवानों का मनोबल ऊंचा रहता है, बल्कि वे आत्महत्या जैसी विषादजनक परिस्थितियों की गिरफ्त में नहीं आते हैं।

विजय शंकर सिंह

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

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