देश को गुलाम बनाने को आप विकास कहते हैं और भारत माता को गुलाम बना कर भारत माता की जय के नारे लगाते हैं

देश को गुलाम बनाने को आप विकास कहते हैं और भारत माता को गुलाम बना कर भारत माता की जय के नारे लगाते हैं

आपको विकास चाहिये था। विकास के लिए खूब रुपये और डॉलर चाहिए थे।

इसके लिए आपने लोगों की जमीन छीनी। गांवों से लोगों को बेदखल किया। हिन्दू और मुसलमान के नाम पर लड़ाया। इंसाफ की बात करने वालों को कारागार में कैद कर दिया। अदालतों को भी दबोच लिया।

एक नाज़ुक पर्वत श्रृंखला है हिमालय पर्वत श्रृंखला

ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा, जिसे यह भी पता न हो कि हिमालय पर्वत श्रृंखला एक नाज़ुक पर्वत श्रृंखला है। जिसकी सतह, रीढ़ या जड़ों को खोदा नहीं जाना चाहिए। यह ध्वस्त हो जाएगा। भरभरा जाएगा। वैज्ञानिक भी जानते और कहते हैं, लेकिन राजनीति इस सच को खारिज़ करती है और जुटी है बांध बनाने में, सुरंगें बनाने में। हो सकता है कि 10, 20 या 40 साल कुछ विलासी सुविधाएं मिल जाएंगी, लेकिन इसके बाद का विनाश प्रलयंकारी होगा। उस विनाश से उबरने में कई दशक या शताब्दियाँ लग जाएंगी। सोचिए कि हमारे जन प्रतिनिधि विनाश के प्रतीकों के प्रचार के विज्ञापनों में हंसते हुए अवतरित होते हैं और जनता भी ताली बजाती है।

फिर आपने नदी बांधी, जंगल उजाड़े, विकास किया। भारत के 50 परिवारों को राष्ट्रीय संपदा का मालिक बना दिया। देश को गुलाम बनाने को आप विकास कहते हैं और भारत माता को गुलाम बना कर भारत माता की जय के नारे लगाते हैं। आपने कुछ युवाओं के लिए भीड़ कंपनी का गठन भी कर दिया है। यह भीड़ कंपनी उस वक्त निकलती है, जब संकट बड़ा होकर सामने आ रहा होता है और 2-5 अनजाने निर्दोष लोगों की नोच नोच कर हत्या कर देती है। असल बात तितर बितर हो जाती है। लोग राम और पैगम्बर की सुरक्षा में तैनात हो जाते है। अजब मूर्ख जमात है ये, उनकी रक्षा करने में जुटने का मायाजाल रचते हैं, जो तीनों लोकों का रचयिता, प्रबंधक और संचालक है। ऐसा ये जमात खुद कहती है।

ग्लोबल वार्मिंग क्या है और ग्लोबल वार्मिंग से विकास का क्या रिश्ता है

विकास दर अब अपने असरदार मुकाम पर पहुंच रही है। धरती गरम हो रही है। विज्ञान इसे ग्लोबल वार्मिंग कहता है। इससे पहाड़ दरकने लगे, बर्फ के पहाड़ पिघलने लगे। बीज खत्म होने लगे हैं। अचानक बाढ़ आ जा रही है, अचानक सूखा आ रहा है। भुखमरी अब नए रूप में विकसित हो रही है। पेट ऐसा भर रहा है कि शरीर भरा-भरा दिखता है, लेकिन वास्तव में खोखला हो रहा है। जन्म होता है बीमारियों के साथ, जीता है आदमी बीमारियों के साथ। मन भी बीमार, तन भी बीमार। बीमार तन और बीमार मन वाला आदमी बर्बरता का विकास कर रहा है। आत्मघात करता है और इसका उत्सव भी मनाता है। जो भी उसे यह सच बताता है कि महाराज, विपत्ति और आपदा का उत्सव मना रहे हो। यह संकट है। उस सच बताने वाले को ये राष्ट्रद्रोही करार देते हैं।

गंगा नदी जो मुक्ति की धारा मानी जाती थी, उसे जहर की धारा बना दिया

जहां ये मुक्ति के लिए तीर्थाटन करते जाते थे, वही पहाड़ अब दरक रहे हैं, बर्फ पिघल कर सैलाब ला रही है। जिस गंगा नदी को मुक्ति की धारा मानते थे, उसे जहर की धारा बना दिया है। यही विकास है। कुल मिलाकर पिशाचों के हाथ में सत्ता और समाज की डोर आ गयी है।

अब पहाड़ धसक रहे हैं, बाढ़ आ रही है और सबकुछ तहस नहस कर रही है। लेकिन हमारी सरकार यह नहीं सोच रही है कि यह प्रलय क्यों आ रहा है? इसे कैसे रोका जाए? इसके बजाय सरकार के विद्वान अधिकारी और नेता यह गणित लगा रहे हैं कि 8000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, यानी अब सरकार बताएगी कि हमें 8000 करोड़ रुपये की जरूरत है ताकि सैलाब पीड़ितों को राहत दी जा सके। इसके लिए पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाया जाएगा, ज्यादा शराब बेंची जाएगी। शिक्षा, पोषण और मनरेगा पर होने वाला खर्चा कम किया जाएगा क्योंकि बाढ़ प्रभावितों को राहत पहुँचाना है।

ऐसा नहीं है कि हमारे नुमाइंदे जानते नहीं हैं कि वे सचमुच “विनाश और विध्वंस” में ही निवेश कर रहे हैं। उन्हें पता है कि उनके विकास कार्यक्रम वर्ष 2030 तक धरती का तापमान 1.5 प्रतिशत बढ़ा देंगे। जिससे और आपदाएं, बीमारियां और बेरोजगारी आएंगी। वे जानते हैं कि इससे आमलोग, किसान, मज़दूर, महिलाएं और बच्चे ज्यादा कमज़ोर होंगे। कमज़ोर समाज को वे अपने 50 पूंजीपति दोस्तों का गुलाम आसानी से बना पाएंगे।

दुःखद यह है कि हमारी सरकार विपत्ति और आपदा को अपने निजी प्रचार का साधन बना लेते हैं। ये कैसे लोग हैं जो सार्वजनिक संसाधनों को जनता के लिए ऐसे उपयोग करते हैं, मानो वे अपनी पुश्तैनी या घर की संपत्ति से अन्न वितरण कर रहे है। संकट यानी महामारी और बाढ़ से जूझते गरीब लोगों को राहत पहुंचाते समय इन्हें अपने खिलखिलाते चेहरे अखबार में छपाते थोड़ा भी संकोच नहीं होता।

हमारे राष्ट्र प्रबंधकों को लगता है कि कमज़ोर लोग चुपचाप जीते और चुपचाप मर जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि कमज़ोर और विकल्पहीन लोग पिशाच सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंकने में सबसे ज्यादा सक्षम होते हैं।

बस समस्या यह है कि इस बार लोग विकास के नाम पर विनाश को ही नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर अधर्म और नीति के नाम पर अनीति को अपनाने के लिए तत्पर हो गए हैं। इस वक्त के समाज का यही अपराध सबसे घातक है। बाकी वक्तों में तो केवल तानाशाही या राजशाही थी, अब बर्बरता ने धर्म का मुखौटा लगाया है और समाज ने उसे सच भी मान लिया है।  लेकिन वक्त आएगा, जब लोग किसी राजनीति दल द्वारा उत्पादित अफीम के बजाए, अपनी आंखों, अपने हृदय और अपनी बुद्धि का स्वयं उपयोग करेंगे।

सचिन कुमार जैन

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

(सचिन कुमार जैन की एफबी टिप्पणी का संपादित रूप साभार)

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner