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‘मैं उर्वशी को शोषित नारी के रूप में देखता हूं’ - दूघनाथ सिंह
‘मैं उर्वशी को शोषित नारी के रूप में देखता हूं’ - दूघनाथ सिंह

कवि-कथाकार दूघनाथ सिंह से 27 साल पहले शम्सुल इस्लाम की बातचीत

शम्सुल इस्लाम
2018-01-16 21:40:18
नामदेव ढसाल  महाराष्ट्र सहित देश की राजनीति को बदल कर रख देने वाला एक कवि
नामदेव ढसाल : महाराष्ट्र सहित देश की राजनीति को बदल कर रख देने वाला एक कवि

खुद ढसाल ने लिखा है कि अगर कविता मुझे नहीं खींचती तो मैं टॉप लेवल का गैंगस्टर या स्मगलर होता या फिर किसी चकला घर का मालिक. किन्तु उनके अन्दर का क...

अतिथि लेखक
2018-01-15 23:26:16
लफ्ज़ों की दरगाह में  सुरजीत पातर
लफ्ज़ों की दरगाह में : सुरजीत पातर

सुरजीत पातर की कविता में व्यथा तो है, पर उससे उबरने की ताकत भी वहां मिलती है। पातर की कविताओं, गीतों और ग़ज़लों में ज़िन्दगी का बहुत ही करीब से स...

अतिथि लेखक
2018-01-14 20:14:44
गोपालदास नीरज – हिन्दी के लोकप्रिय गीतकवि
गोपालदास नीरज – हिन्दी के लोकप्रिय गीतकवि

उसकी हर बात पर हो जाती हैं पागल कलियां जाने क्या बात है नीरज के गुनगुनाने में

वीरेन्द्र जैन
2018-01-09 21:51:46
साहित्य पुरस्कारों का ऐलान नए कार्यक्रमों में गांवों में आयोजित होंगे ड्रामा-आलोक
साहित्य पुरस्कारों का ऐलान, नए कार्यक्रमों में गांवों में आयोजित होंगे ड्रामा-आलोक

अकादमी साल भर में 102 पुरस्कार देती है और अब नए अध्यक्ष का चयन भी शुरू हो चुका है।

देशबन्धु
2017-12-22 13:12:29
त्रिलोचन का मूल्यांकन अभी होना है अभी तो उन्हें ठीक से पढ़ा भी नहीं गया है
त्रिलोचन का मूल्यांकन अभी होना है, अभी तो उन्हें ठीक से पढ़ा भी नहीं गया है

त्रिलोचन का जन बावजूद प्रहारों के जीवन का हिमायती, रोजमर्रा की जिंदगी को जीता हुआ, जो नहीं है, उसके लिए तैयारी करता हुआ जनपदीय जन है, जबकि नागार्...

अतिथि लेखक
2017-12-09 21:33:30
जब कुंवरनारायण ने पूछा था उदय प्रकाश के साथ वही तो नहीं किया जा रहा है जो मोहन दास के साथ हुआ
जब कुंवरनारायण ने पूछा था उदय प्रकाश के साथ वही तो नहीं किया जा रहा है, जो मोहन दास के साथ हुआ

उनके विचार और चिंतन. कहीं कोई जड़ता और अतीतोन्मुख मतान्धता नहीं. आधुनिकता , तर्कशीलता और उदार प्रगतिकामी विचारों को वे निरंतर अपने समय-समय पर लिखे...

अतिथि लेखक
2017-11-16 10:11:55
मुक्तिबोध के बहाने नामवर सिंह पर बहस
मुक्तिबोध के बहाने नामवर सिंह पर बहस

अस्‍मि‍ता वि‍मर्श मूलत: पूंजीवादी वि‍मर्श है। क्‍या अस्‍मि‍ता वि‍मर्श अस्‍मि‍ता, जा‍ति, धर्म, भाषा, नस्‍ल, गोत्र, वर्ग आदि‍ के आधार पर तय होगा या...

जगदीश्वर चतुर्वेदी
2017-11-15 22:21:17
मुक्तिबोध की यह स्पष्ट मान्यता है कि अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे
मुक्तिबोध की यह स्पष्ट मान्यता है कि अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

मुक्तिबोध लेखक के लिए जनतंत्र की तलाश करने वाले लेखक हैं। वे जानते हैं कि लेखक की स्वतंत्रता को खत्म करने से समाज की कितनी हानी होगी। असल में यह ...

अतिथि लेखक
2017-11-13 21:23:38
‘ये सफ़र था कि मुक़ाम था’ के बहाने राजेन्द्र यादव पर एक चर्चा
‘ये सफ़र था कि मुक़ाम था’ के बहाने राजेन्द्र यादव पर एक चर्चा

जनवाद के नाम पर गलत प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने वाले और सुविधाभोग व आडम्बर से भरा जीवन जीने वाले राजेन्द्र यादव को लोग साहित्य के अंडरवर्ल्ड का डॉ...

अतिथि लेखक
2017-11-07 10:16:29
अदम गोंडवी  समय से मुठभेड़
अदम गोंडवी : समय से मुठभेड़,

आज जो विकास की बातें कहकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं और जनता को झांसापट्टी देना चाहते हैं, उनके चरित्र को अदम ने ग़ज़ल-दर-ग़जल उजागर किया है

अतिथि लेखक
2017-10-22 19:25:54
साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब  मैनेजर पांडेय
साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब : मैनेजर पांडेय

कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है। इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-10-12 11:11:31
समय जैसा है उसे ही लिखा जाए…संदर्भ प्रेमचंद का प्रयाण दिवस
समय जैसा है, उसे ही लिखा जाए….संदर्भ प्रेमचंद का प्रयाण दिवस

आजादी और बँटवारे ने गांधी जी के अनुयायी, स्वतंत्रता सेनानी प्रेमचंद के युग का अंत कर दिया था। न सिर्फ अंग्रेज़ चले गये, बल्कि बँटवारे से उनके काल...

अरुण माहेश्वरी
2017-10-08 13:04:45
अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा रहे लेखकों ने महसूस की भूखंड की तपन
अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा रहे लेखकों ने महसूस की भूखंड की तपन

दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं के बाद गौरी लंकेश की हत्या से इस तरह की वहशियाना हरक़त के प्रति पूरे समाज में रोष फैला है।

अतिथि लेखक
2017-10-05 00:17:49
छबीला रंगबाज का शहर का लोकार्पण
छबीला रंगबाज का शहर का लोकार्पण

हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। 'छबीला रंगबाज का शहर' में ऐसे ही चरित...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-09-20 22:24:26
संवाद रंग हबीब  एक सफा खत्म होने का मतलब होता है नया सफा शुरू करना
'संवाद रंग हबीब' : एक सफा खत्म होने का मतलब होता है, नया सफा शुरू करना

हबीब तनवीर कहते थे लोककला को कारपोरेटीकरण से बचाना होगा इसलिए उन्होंने कभी कारपोरेट से कोई सहयोग नहीं लिया

अतिथि लेखक
2017-09-18 21:40:51
अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी
अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी ...

अतिथि लेखक
2017-09-13 11:32:02
मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां
मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां

स्मृतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण करती हैं। स्मृति विहीन समाज क्रूर, हिंसक और दुस्साहसी हो जाता है। पूंजी निरंतर हमें हमारी स्मृतियों से काटने का...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-09-03 18:52:57