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बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ
बीसवीं सदी में फ़ैज़ जैसा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं हुआ

फ़ैज़ के व्यक्तित्व में जो बागीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी,  गरीबी,  लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र

जगदीश्वर चतुर्वेदी
2018-11-21 10:27:22
यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है देह ही देश
यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है 'देह ही देश'

बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना भीषण सामाजिक विकृति

हस्तक्षेप डेस्क
2018-11-19 22:01:59
भाषा आदमी की अपनी पहचान को खत्म करती है हेगेल ने कहा है शब्द वस्तु की हत्या के सबब होते हैं
भाषा आदमी की अपनी पहचान को खत्म करती है, हेगेल ने कहा है 'शब्द वस्तु की हत्या के सबब होते हैं'

पुरातनपंथी और जड़ विचारों से जकड़ा हुआ समाज न कभी किसी भाषा के विकास में सहयोगी बन सकता है और न संस्कृति के विकास में।

अरुण माहेश्वरी
2018-11-04 11:14:05
हिन्दू कालेज में देह ही देश
हिन्दू कालेज में 'देह ही देश'

औरतों की देह पर ही लड़े जाते हैं सभी युद्ध... उग्र राष्ट्रवाद और पूंजीवाद मिलकर युद्ध को अपने हितों का व्यवसाय बना देते हैं

हस्तक्षेप डेस्क
2018-10-30 19:21:46
गोडसे@गांधीकॉम
गोडसे@गांधी.कॉम

बापू नाथूराम गोडसे की गोली से मरते नहीं बल्कि होश में आने पर वो सबसे पहले गोडसे के बारे में जानना चाहते हैं।

हस्तक्षेप डेस्क
2018-10-08 18:51:40
छबीला रंगबाज का शहर में हमारे समय की जीती जागती तस्वीरें हैं – मनोज झा
'छबीला रंगबाज का शहर' में हमारे समय की जीती जागती तस्वीरें हैं – मनोज झा

हिन्दू कालेज में छबीला रंगबाज का शहर का मंचन

हस्तक्षेप डेस्क
2018-10-06 23:37:18
प्रतिबद्धता के ज़मीनी चेहरे
प्रतिबद्धता के ज़मीनी चेहरे

ऐसे लोगों के ऐसे जज़्बे देखकर उलट उदाहरणों का भी ख़याल आता है जो अपना पक्ष बदलने के लिए किसी न किसी बहाने के इंतज़ार में ही रहते हैं।

अतिथि लेखक
2018-09-27 22:25:21
यह क्रूरता के अद्भुत साधारणीकरण का समय है -  प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल
यह क्रूरता के अद्भुत साधारणीकरण का समय है -  प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल

हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान

अतिथि लेखक
2018-09-24 22:36:36
रामचंद्र गुहा की नई किताब और किताबों की कीमत का सवाल
रामचंद्र गुहा की नई किताब और किताबों की कीमत का सवाल

यह सच है कि हिंदी की किताबों की कम बिक्री उसकी कीमतों को प्रभावित करती है। लेकिन किताब की अधिक कीमत उसकी बिक्री को भी बाधित करती है।

अरुण माहेश्वरी
2018-09-21 12:14:29
समीर अमीन  मार्क्सवाद के एक योद्धा का निधन
समीर अमीन : मार्क्सवाद के एक योद्धा का निधन

मार्क्सवाद को नए आयाम देने वाले तथा जनवादी दुनिया के सपने के आशाद्वीप समीर अमीन ने ऐसे समय दुनिया को अलविदा कह दिया जब उनकी बेइम्तहां जरूरत थी

ईश मिश्र
2018-09-08 00:24:49
नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द
नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द

उग्रपंथियों का संघर्ष वैसे लोगों का संघर्ष है, जो शहरी जीवन से बेहद दूर पर्वतीय इलाके में सरकारी तंत्र और शोषण का अनाचार सहते रहे हैं।

अतिथि लेखक
2018-09-07 20:54:57
ईमानदार पाठक भी वस्तुत बहुत बड़ा कवि होता है - विष्णु खरे
ईमानदार पाठक भी वस्तुत: बहुत बड़ा कवि होता है - विष्णु खरे

कविता पढ़ना बहुत परिश्रम की मांग करता है और इसके लिए विश्व पाठक बनना होगा।

अतिथि लेखक
2018-08-28 19:35:19
तेरी गल्ल्याँ  मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा
'तेरी गल्ल्याँ' : मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा

नाटक एकदम समाज के उस वर्ग को अभियुक्त बना देता है जो अपने बच्चों पर धन दौलत उपहारों को लुटाकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ लेता है.

शमशाद इलाही शम्स
2018-08-20 22:07:47
नायपॉल नहीं रहे विद्वेषी चुप हो गया
नायपॉल नहीं रहे, विद्वेषी चुप हो गया

नायपॉल का कहना था, आप अपनी आत्म-जीवनी में झूठ बोल सकते हैं, लेकिन उपन्यास में नहीं। वहां झूठ की जगह नहीं होती। वह लेखक को पूरी तरह से खोल देता है।

हस्तक्षेप डेस्क
2018-08-14 08:51:48
विश्वनाथ तिवारी  सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख
विश्वनाथ तिवारी : सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख

तिवारीजी का लेखकीय आचरण लेखकों की हत्या के प्रसंग में शून्य है। सवाल यह है विश्वनाथ तिवारी नामक लेखक इस विरोध में सबसे पहले शामिल क्यों नहीं हुआ ॽ

जगदीश्वर चतुर्वेदी
2018-08-09 19:54:23
सेवासदन में भारतीय विवाह संस्था का क्रिटिक -  गरिमा श्रीवास्तव
सेवासदन में भारतीय विवाह संस्था का क्रिटिक -  गरिमा श्रीवास्तव

सेवासदन में भारतीय विवाह संस्था का क्रिटिक -  गरिमा श्रीवास्तव

हस्तक्षेप डेस्क
2018-08-01 12:41:51
गुरु पूर्णिमा  गुरुवर नामवर सिंह और ‘आलोचना का कब्रिस्तान’
गुरु पूर्णिमा : गुरुवर नामवर सिंह और ‘आलोचना का कब्रिस्तान’

डा. रामविलास शर्मा तो बहुत पहले ही द्वंद्वात्मक विचार की राह को छोड़ अतीत की आधिभौतिक साधना की ओर रुख कर चुके थे, नामवर जी ने अभिनंदन-मंचों की शो...

अरुण माहेश्वरी
2018-07-27 12:31:56
प्रेमचंद किसान को सुखी देखना स्त्री की मुक्ति और दलितों के लिए सामाजिक न्याय चाहते थे
प्रेमचंद किसान को सुखी देखना, स्त्री की मुक्ति और दलितों के लिए सामाजिक न्याय चाहते थे

युवा लेखक अपनी हताशा को भी देख रहे हैं और अंधेरे समय को भी। उन्हें पता है, क्रांति यकायक नहीं आयेगी। जहां आज के साहित्य में प्रयोग की निजता पर...

अतिथि लेखक
2018-07-25 18:55:57