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नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य
नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य

नक्सलबाड़ी से उठी ज्वाला की लपटें जैसे-जैसे फैलती गई, अन्य भाषाओं के साहित्य में भी उसकी आहटें सुनाई देने लगी और हिंदी साहित्य इससे अछूता कैसे रह...

अतिथि लेखक
2017-05-09 17:08:11
दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा को बुन्देली में आगे बढाया महेश कटारे ‘सुगम’ ने
दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा को बुन्देली में आगे बढाया महेश कटारे ‘सुगम’ ने

महेश कटारे सुगम की पहचान इससे ही है कि उन्होंने इस दौर की सबसे लोकप्रिय विधा गज़ल के माध्यम से टकसाली बुन्देली में ऐसी रचनाएं दी हैं जो अपने समय क...

वीरेन्द्र जैन
2017-04-23 23:03:19
सीखें जानें जुड़ें जोड़ें और निडरता से खड़े हों लेखक - विनीत तिवारी
सीखें, जानें, जुड़ें, जोड़ें और निडरता से खड़े हों लेखक - विनीत तिवारी

यात्रा का उद्देश्य लेखकों की शहादत के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करना एवं शहीद लेखकों...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-03-15 22:53:20
समझ और सरोकार कविता का हासिल
समझ और सरोकार कविता का हासिल

एक कवि के लिए यह आवश्यक है कि वह वैज्ञानिक चेतना से पूरी तरह लैस हो। क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसता, उ...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-03-02 17:34:52
चर्चा में ‘समाज का आज’
चर्चा में ‘समाज का आज’

इन लेखों में कोई भी पीड़ा सघन रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है, उसकी सूचना मात्र है. फिर भी, किताब की पठनीयता की उन्होंने उन्मुक्त सराहना की.

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-19 22:53:51
मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं
मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं

मुक्तिबोध की कविताओं में आत्म संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। वे सच्चे अर्थों में किसानों मजदूरों से जुड़कर कविताएं लिखते थे।

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-07 01:44:20
कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी- कुमार अंबुज
कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी- कुमार अंबुज

जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है, उनका हल निकालने में मदद कर सकता है और अंततः समूची मानवता को मुक्ति ...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-06 23:46:33
सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थे मुक्तिबोध  ललित सुरजन
सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थे मुक्तिबोध : ललित सुरजन

मुक्तिबोध जैसी समझ दुनिया में कितने लोगों की होती है। किसानों मजदूरों वचितों के साथ उनमें राजनैतिक चेतना की गहरी समझ थी।मुक्तिबोध दुरुह नहीं अपित...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-05 12:25:28
रैम्प पर खादी खादी आश्रम में तम्बोला
रैम्प पर खादी, खादी आश्रम में तम्बोला

गुलाम देश की जनता ने गांधी को ही नहीं, उनके सपनों को भी सिर-माथे लिया था। उनके लिये लाठियां खायीं, कोड़े खाए, पर आजाद भारत ने उनकी एक-एक याद को रो...

राजीव मित्तल
2017-01-31 10:27:28
‘मनुष्य से बड़ा कौनसा लक्ष्य हो सकता है’- स्वयं प्रकाश
प्रेमचंद का लेखन तमगों का मोहताज नहीं
 मुल्क को ईदी कौन देगा