शब्द > आलोचना
छबीला रंगबाज का शहर का लोकार्पण
छबीला रंगबाज का शहर का लोकार्पण

हमारे चरित्रहीन समय में बड़े चरित्रों का बनना बंद हो गया है इसलिए परिवेश ने अब चरित्रों का स्थान ले लिया है। 'छबीला रंगबाज का शहर' में ऐसे ही चरित...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-09-20 22:24:26
संवाद रंग हबीब  एक सफा खत्म होने का मतलब होता है नया सफा शुरू करना
'संवाद रंग हबीब' : एक सफा खत्म होने का मतलब होता है, नया सफा शुरू करना

हबीब तनवीर कहते थे लोककला को कारपोरेटीकरण से बचाना होगा इसलिए उन्होंने कभी कारपोरेट से कोई सहयोग नहीं लिया

अतिथि लेखक
2017-09-18 21:40:51
अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी
अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी ...

अतिथि लेखक
2017-09-13 11:32:02
मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां
मनुष्यता के लिए क्यों जरूरी हैं स्मृतियां

स्मृतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण करती हैं। स्मृति विहीन समाज क्रूर, हिंसक और दुस्साहसी हो जाता है। पूंजी निरंतर हमें हमारी स्मृतियों से काटने का...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-09-03 18:52:57
भगवत रावत  हिंदी की लोक परंपरा के प्रतिनिधि कवि
भगवत रावत : हिंदी की लोक परंपरा के प्रतिनिधि कवि

आज जब प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर अधिकांश कविताएं जहां सपाटबयानी, जुमलेबाज़ी और कोरी भावुकता की अभिव्यक्ति मात्र रह गई हैं, भगवत रावत की कविता...

अतिथि लेखक
2017-08-31 22:07:00
बुरी है आग पेट की बुरे हैं दिल के दाग़ ये न दब सकेंगे एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये
बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये, न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये...

शैलेन्द्र एक प्रतिबद्ध राजनीतिक रचनाकार थे। जिनकी रचनाएं उनके राजनीतिक विचारों की वाहक थीं और इसीलिए वे कम्युनिस्ट राजनीति के नारों के रुप में आज...

अतिथि लेखक
2017-08-30 17:10:09
पंजाबी कविता का ध्रुवतारा  शिव कुमार बटालवी
पंजाबी कविता का ध्रुवतारा : शिव कुमार बटालवी

विरह उनकी कविता का मूल स्वर हैं, क्योंकि इसे अपने जीवन में उन्होंने भोगा था। वे कविता में क्रांति, व्यवस्था-परिवर्तन आदि की बातें नहीं करते थे, ब...

अतिथि लेखक
2017-08-30 13:23:46
21वीं सदी की सुबह आने से पहले ही जलता हुआ सवाल छोड़ कर चले गए गोरख पांडेय
21वीं सदी की सुबह आने से पहले ही जलता हुआ सवाल छोड़ कर चले गए गोरख पांडेय

जितने भी जनकवि हुए, नागार्जुन से लेकर त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल तक, शुरू में जबरदस्त उपेक्षा के शिकार रहे। गोरख पांडेय लघुमानवों के कवि नहीं, ...

अतिथि लेखक
2017-08-28 13:10:58
मैथिलीशरण के काव्‍य में स्‍वतंत्रता की चेतना – प्रो गिरीश्‍वर मिश्र
मैथिलीशरण के काव्‍य में स्‍वतंत्रता की चेतना – प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र

मैथिलीशरण गुप्‍त ने देश की स्‍वतंत्रता के लिए लोगों में जागरूकता लाने के लिए कविता के माध्‍यम से बड़ा योगदान दिया। उनकी कविताओं ने स्‍वतंत्रता की ...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-08-06 19:55:25
सबसे बड़ा सच  मीडिया तो झूठन है दिलों और दिमाग को बिगाड़ने में साहित्य और कला माध्यम निर्णायक वहां भी संघ परिवार का वर्चस्व
सबसे बड़ा सच : मीडिया तो झूठन है, दिलों और दिमाग को बिगाड़ने में साहित्य और कला माध्यम निर्णायक, वहां भी संघ परिवार का वर्चस्व

अभी तो ताराशंकर और बंकिम की चर्चा की है, आगे मौका पड़ा तो बाकी महामहिमों के सच की चीरफाड़ और उससे कहीं ज्यादा समकालीनों के मौकापरस्त सुविधावादी स...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-07-21 00:46:59
एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला “छोकरा” जिसने इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त को टक्कर दी
एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला “छोकरा” जिसने इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त को टक्कर दी

शैलेश मटियानी और उनके कृतित्व को समझने के लिए हमारे हिसाब से हिंदी और भारतीय साहित्य के हर पाठक को ताराचंद्र त्रिपाठी का यह आलेख अवश्य पढ़ना चाहिए।

पलाश विश्वास
2017-07-14 12:57:21
कविताओं में लोक की गाथा - जनपद झूठ नहीं बोलता
कविताओं में लोक की गाथा - जनपद झूठ नहीं बोलता

जहां आदिवासी है, वहां शोषण जरूर होगा। वहां वे कॉरपोरेट भी होंगे जो संसाधनों के दोहन के लिए तत्पर होंगे

अतिथि लेखक
2017-07-13 10:19:03
तद्भव का नया अंक  इतिहास के त्रिभागी काल विभाजन पर हरबंस मुखिया
तद्भव का नया अंक : इतिहास के त्रिभागी काल विभाजन पर हरबंस मुखिया

आने वाली पीढ़ी हमारे वर्तमान युग को मध्ययुग कहे या न कहे, कोई मायने नहीं रखता। लेकिन यह तय है कि हम अपने वर्तमान को जिस रूप में देखते है, आगत पीढ़ि...

अतिथि लेखक
2017-07-02 00:26:10
मुनि जिनविजय यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठित करते हैं
मुनि जिनविजय यूरोपीय समझ के समानांतर भारतीय ज्ञान और परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठित करते हैं

हिंदी का आधुनिक साहित्य परम्परा से नहीं जुड़ता। हमारी स्मृति और संस्कार में हमारा जातीय साहित्य नहीं है।

हस्तक्षेप डेस्क
2017-06-18 23:32:41
किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं
किसानों के पक्ष का कोई समकालीन भारतीय साहित्य दिखता नहीं

सिर्फ महाजन, सूदखोर और दूसरे सामाजिक तत्व ही नहीं, भारतीय बैंकिग प्रणाली भी इस महाजनी सभ्यता के नये अवतार हैं।

पलाश विश्वास
2017-06-13 14:59:05
कालजयी रचना  विभाजन की त्रासदी का सच है ‘तमस’
कालजयी रचना : विभाजन की त्रासदी का सच है ‘तमस’

इस उपन्यास में आजादी के ठीक पहले साम्प्रदायिकता के चरम उभार और दंगों का ऐसा चित्रण किया गया है कि वह पाठकों की आत्मा को झकझोर डालता है।

अतिथि लेखक
2017-06-07 15:23:59
नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य
नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य

नक्सलबाड़ी से उठी ज्वाला की लपटें जैसे-जैसे फैलती गई, अन्य भाषाओं के साहित्य में भी उसकी आहटें सुनाई देने लगी और हिंदी साहित्य इससे अछूता कैसे रह...

अतिथि लेखक
2017-05-09 17:08:11
दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा को बुन्देली में आगे बढाया महेश कटारे ‘सुगम’ ने
दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा को बुन्देली में आगे बढाया महेश कटारे ‘सुगम’ ने

महेश कटारे सुगम की पहचान इससे ही है कि उन्होंने इस दौर की सबसे लोकप्रिय विधा गज़ल के माध्यम से टकसाली बुन्देली में ऐसी रचनाएं दी हैं जो अपने समय क...

वीरेन्द्र जैन
2017-04-23 23:03:19