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आज के दौर का तराना  लड़ते हुवे सिपाही का गीत बनो रे हारना है मौत तुम जीत बनो रे
आज के दौर का तराना : लड़ते हुवे सिपाही का गीत बनो रे, हारना है मौत, तुम जीत बनो रे

लड़ते हुवे सिपाही का गीत बनो रे, हारना है मौत, तुम जीत बनो रे।  गाइये, दोस्तों/परिवार/पड़ोस को सुनाइये। 

शम्सुल इस्लाम
2017-06-07 16:33:58
वहाँ पानी नहीं है  दर्द को जुबान देती कविताएँ
वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ

दिविक रमेश कविताओं में जिस तरह शब्दों को बरतते हैं, उससे एक सांगीतिक रचना भी होती है।

हस्तक्षेप डेस्क
2017-05-26 16:09:07
खामोशियाँ ज़िंदा रहें
खामोशियाँ ज़िंदा रहें

हस्तक्षेप डेस्क
2017-05-24 16:38:08
इतिहास के हर पन्ने पर खून की लकीरें  इतिहास नहीं चश्मा बदलें
इतिहास के हर पन्ने पर खून की लकीरें : इतिहास नहीं चश्मा बदलें

दूर देशों से हूण शक यूनानी अरब कई अौर आये घर बसा यहीं के हो गये देश की मिट्टी में मिली सबकी मिट्टी कौन जाने किसकी रगों में किसका खून है ...

जसबीर चावला
2017-05-17 18:15:55
वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है
वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है

हमारी दुनिया में इतने रंग और जटिलताएं हैं कि उन्हें समेटना हो तो कविता करने से सरल कोई तरीका नहीं हो सकता...जो समय की जटिलता को समेटती है वो कवित...

अतिथि लेखक
2017-05-12 18:24:23
नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य
नक्सलबाड़ी और हिंदी साहित्य

नक्सलबाड़ी से उठी ज्वाला की लपटें जैसे-जैसे फैलती गई, अन्य भाषाओं के साहित्य में भी उसकी आहटें सुनाई देने लगी और हिंदी साहित्य इससे अछूता कैसे रह...

अतिथि लेखक
2017-05-09 17:08:11
आदिवासियों की चिंता क्यों है तुम्हें
आदिवासियों की चिंता क्यों है तुम्हें?

मिटटी में मिलाना चाहते हो तुम आदिवासियत को उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर बलात्कार करना चाहते हो तुम आदिवासी महिलाओं का ...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-05-02 18:54:52
क्यों बदल गई कविता
क्यों बदल गई कविता

कविता गुस्सा गुबार उलाहना बनी है कविता पाखण्ड की परतें उधेड़ रही है ताल ठोंक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ी है कटघरे में खड़ा करती उठी उँगली ह...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-04-14 23:19:38
जब अमेरिका डरता है तो शुरू होती है विचारों पर निगरानी
जब अमेरिका डरता है तो शुरू होती है विचारों पर निगरानी

जब अमेरिका डरता है,  किसी भी घर की शांति गुम हो जाती है. जब अमेरिका डरता है, अँधेरे में बहती हवा संदिग्ध बन जाती है.

अतिथि लेखक
2017-04-12 00:12:33
पाग़ल हो गए हैं संघी मन्द्राक्रान्ता सेन को इस कविता के लिए दी सामूहिक बलात्कार की धमकी
पाग़ल हो गए हैं संघी, मन्द्राक्रान्ता सेन को इस कविता के लिए दी सामूहिक बलात्कार की धमकी

संघी पाग़ल हो गए हैं। बांग्ला कवि मन्द्राक्रान्ता सेन को इस कविता के लिए सामूहिक बलात्कार की धमकी दे डाली। कविता का शीर्षक है -- बदल दो जीवन।

पलाश विश्वास
2017-04-02 21:59:13
…हे इरोम शोक मत मनाना
…..हे इरोम शोक मत मनाना....

हस्तक्षेप डेस्क
2017-03-13 11:17:19
कालिखो पुल हमारे चेहरे पर लगी कालिख है
कालिखो पुल हमारे चेहरे पर लगी कालिख है

कौन है कालिखो पुल एक नाम मर कर सतत उठी हुई उँगली का एक नाम, जो कोड़ा है भ्रष्ट व्यवस्था के उघड़े तन पर एक जायज़ गुस्सा है विधायिका...

जसबीर चावला
2017-02-28 23:15:03
मैं प्रेम की कविता नहीं लिखता
क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?