शब्द > कविता
एय मेरी तुलू ए नूर  तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर
एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर ..

एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर .. कर शुरूआत नयी .. लिक्ख उजाले  अपनी लकीरों में .. तू ख़ुशियों का अर्क पी ..

अतिथि लेखक
2018-09-24 20:25:36
मैं भी नक्सल तू भी नक्सल
मैं भी नक्सल तू भी नक्सल

दवा मंगाओ तो भी नक्सल लिंचिंग का विरोध भी नक्सल बच्चों की ऑक्सीजन नक्सल माँऔं की चीज़ें भी नक्सल ख्वाबों की लाश भी नक्सल

अतिथि लेखक
2018-09-01 19:06:02
यह खुद बेहद डरे हुए हैं इस नंगी औरत से
यह खुद बेहद डरे हुए हैं ....इस नंगी औरत से ....

कौन है ..? किसकी क्या लगती है ? कुछ भी तो नहीं पता ...बद़जात का ... एैसी वैसी ही है  ...यह औरत ... शायद औरत भी नहीं है ... यह तो महज़...

अतिथि लेखक
2018-08-25 18:40:02
मैं "राजधर्म" में नहीं-नहीं मैं "लोकधर्म" में जिंदा हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी ने मृत्यु-उपरांत लिखी कविता
तुम मनाओ 15अगस्त मैं अफ़सोस मनाऊँगी  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस
तुम मनाओ 15अगस्त..../ मैं अफ़सोस मनाऊँगी..../  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस.....

हाँ हमने मान लिया.... हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म हैं... जिस्म.... बग़ैर फ़र्क़ कि उम्र क्या है... 5..7..12...14...सब चलती हैं......,

अतिथि लेखक
2018-08-14 21:48:46
संवेदनाओं का कब्रिस्तान बन गई है हमारी बुतपरस्त-मुर्दा परस्त अंतरात्मा
संवेदनाओं का कब्रिस्तान बन गई है हमारी बुतपरस्त-मुर्दा परस्त अंतरात्मा

सम्मानित नरभक्षी पशुओं को जो जंगल में नहीं शहर के संभ्रांत बस्तियों में रहते हैं

ईश मिश्र
2018-08-06 09:51:51
मन की व्यथा कहने पर कुचलने वाले लोग
मन की व्यथा कहने पर, कुचलने वाले लोग

स्वर्णिम युग के सपने में, सोते हुए ये लोग, स्वयं के पैर पर खुशी से कुल्हाड़ी मारते लोग।

अतिथि लेखक
2018-08-05 17:41:48
चालीस साला औरतें  इस तरह ढह जाता है एक देश
चालीस साला औरतें : इस तरह ढह जाता है एक देश

कविताओं ने हमेशा ही फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की है । कविताओं ने हमेशा ही समाज को सही राह दिखाने का काम किया गया है और हमेशा ही फासिज्म के विरुद्ध हथ...

अतिथि लेखक
2018-07-25 12:49:19
मॉब लिंचिंग  शहर का कानून अँधा है खुल कर शिकार करें
मॉब लिंचिंग : शहर का कानून अँधा है खुल कर शिकार करें

रेल में,जेल में करें कट्टे लाठी से करें पीट पीट कर करें जैसा जी चाहे करें शहर का कानून अँधा है खुल कर शिकार करें

जसबीर चावला
2018-07-24 10:02:02
हैं  साहेब बड़े अज़ीज़ सारे ही महफ़िलों में पर सबके सामने झूठ  बोलना आसाँ नहीं होगा 
हैं  ''साहेब'' बड़े अज़ीज़ सारे ही महफ़िलों में/ पर सबके सामने झूठ  बोलना आसाँ नहीं होगा 

जो चुनरी थी अब तक, चिंगारी बन चुकी है यहाँ  बच्चियों पे अब और ज़ुल्म ढाना आसाँ नहीं होगा 

अतिथि लेखक
2018-07-23 22:31:50
यूँ तो मुझे 
खुद छूना था उसे 
छू भी लेती 
पर क्या करूँ
कैसे बेख़ौफ़ शनि मंगल के उतारों को पचा गया वो भूख का शिकार बच्चा मेरे टोटके भी खा गया
कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया/ वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया...

कैसे बेख़ौफ़ ..शनि मंगल के उतारों को पचा गया/ वो भूख का शिकार बच्चा ..मेरे टोटके भी खा गया...

अतिथि लेखक
2018-07-10 23:13:36
यह आसिफा का बदला था  अब तुम लो मंदसौर का बदला औरतें चिथड़ रही हैं और दुनिया में फिर शर्म से तार-तार है तिरंगा
..यह आसिफा का बदला था ? अब तुम लो मंदसौर का बदला... औरतें चिथड़ रही हैं ..और दुनिया में फिर शर्म से तार-तार है तिरंगा

पूरा यक़ीन ..हर बार की तरह ...तुम ...फिर से दबा ही दोगे ..यह रेप वाली बात ...मुद्दा गरम होगा  ...किस धर्म के लड़कों ने ...इस रेप को दिया है अंजाम

अतिथि लेखक
2018-07-01 10:41:53
सब कुछ बिकता है धड़ल्ले सेमुफ़लिसों को मौत मोहलत नहीं देती
सब कुछ बिकता है धड़ल्ले से...मुफ़लिसों को ...मौत ....मोहलत नहीं देती

शोर तो यही है ...बग़ैर तेरी इजाज़त पत्ता नहीं हिलता ....तो क्या मैं ..समझूँ इन तमाशों में ...तू भी शरीक है ?

अतिथि लेखक
2018-06-29 15:52:14