अबकी बार जुमलेबाज़ सरकार, एक देश, एक टैक्स भी आखिरकार जुमला ही साबित हुआ

जिस मलेशिया का उदाहरण देकर सरकार ने जीएसटी को सही बताया था, वहां भी अब जीएसटी खत्म हो गया है...

देशबन्धु

अबकी बार जुमलेबाज़ सरकार, एक देश, एक टैक्स भी आखिरकार जुमला ही साबित हुआ

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रेकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई हैं। रविवार को दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 76.57 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई, जबकि मुंबई में पेट्रोल 84.49 रुपये प्रति लीटर, चेन्नै में 79.47 रुपये और कोलकाता में 79.24 रुपये पहुंच गया है। अलग-अलग शहरों में तेल की कीमतें अलग इसलिए किए हैं, क्योंकि उन पर टैक्स भी राज्य अलग-अलग लगाते हैं। अब इसमें यह सवाल पूछना बेकार है कि सरकार ने आधी रात को संसद में जीएसटी की शुरूआत का जो तामझाम किया था, उसका उद्देश्य कहां गुम हो गया? एक देश, एक टैक्स भी आखिरकार जुमला ही साबित हुआ। 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं और उसका असर तेल के आयातक देशों पर बहुत पड़ा था। तब पेट्रोल 76.06 रुपये तक पहुंच गया था।

बहुत हुई जनता पर पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार

भारत भी अपनी जरूरत का तेल आयात ही करता है, लिहाजा कीमतें उसके नियंत्रण में नहीं थीं। तब भाजपा के प्रचारक और नेता इस बात को अच्छी तरह समझते थे, फिर भी जनता को मूर्ख बनाने और सत्ता हथियाने के लिए नारा दे दिया बहुत हुई जनता पर पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार। इस पोस्टर पर तब प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की एक ऐसी तस्वीर लगी है, जिसकी मुखमुद्रा देखकर अहसास होता है कि ये शख्स सचमुच बदलाव करेगा। ऐसे कई पोस्टरों, विज्ञापनों को देखकर जनता झांसे में आ गई और फिर जो हुआ, उसके वर्णन की आवश्यकता शायद नहीं है। भाजपा सत्ता में चार साल बिता चुकी है और उसके तमाम वादे जुमले ही साबित हो रहे हैं। मोदीराज में वादों का जुमलों में बदलना भी अपने आप में एक रिकार्ड ही है।

बहरहाल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि पेट्रोलियम नियार्तक देशों के संगठन यानी ओपेक देशों में तेल के कम उत्पादन की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड के दाम बढ़ गए हैं। इसके पीछे डिमांड में वृद्धि होना, सऊदी अरब की अगुवाई में तेल उत्पादक देशों का उत्पादन में कमी करना, वेनेजुएला में उत्पादन में गिरावट और अमेरिका का ईरान पर प्रतिबंध लगाने का फैसला जैसे कारण हैं।

क्या बेखबर थी मोदी सरकार ?

मंत्री महोदय ने जो वजहें गिनाई हैं, वे सभी जायज हैं। लेकिन यह सब एक दिन में तो नहीं हुआ। बीते कुछ महीनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी हलचल होना शुरु हो गई थी। तो क्या मोदी सरकार इतनी बेखबर थी कि उसने इस स्थिति की कोई तैयारी ही नहीं की थी? जब तक कर्नाटक चुनाव के लिए मतदान नहीं हुआ, पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ीं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही जनता पर बोझ बढ़ाने में सरकार को जरा सा संकोच नहीं हुआ।

अंतरराष्ट्रीय बाजार के आगे हम मजबूर हैं, जैसे तर्क पहले ही गढ़ लिए गए थे। अगर चुनाव तक कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सकता है, तो बाद में पूरा न सही, थोड़ा-बहुत अंकुश तो लगाया जा ही सकता है। बशर्ते इसके लिए इच्छाशक्ति हो। लेकिन जनता को राहत देने जैसी कोई बात मोदी सरकार की प्राथमिकता सूची में नजर नहीं आती।

धर्मेन्द्र प्रधान मानते हैं कि देश के लोगों को और मुख्यत: मध्यम वर्ग के लोगों पर पेट्रोल, डीजल की कीमतों का बुरा असर पड़ा है। वे कहते हैं कि भारत सरकार इसका हल निकालने के लिए जल्द ही कोई कदम उठाएगी। लेकिन वे यह साफ नहीं करते कि इस दिशा में सरकार क्या कदम उठाने जा रही है। अगर सरकार हल निकालने की बात करती है, तो कुछ तो रणनीति उसने तैयार की होगी।

पिछले साल अक्टूबर में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 2 रुपये प्रति लीटर की कमी की थी। लेकिन क्रूड के दामों में तेजी जारी रहने से इसका असर जल्द ही समाप्त हो गया था। जब नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच क्रूड के दाम गिर रहे थे। उस दौरान केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 11.77 रुपये और डीजल पर 13.47 रुपये प्रति लीटर बढ़ाई थी। जब क्रूड  के दाम कम थे, तो सरकार ने एक्साइस ड्यूटी लगाकर जनता से वसूली की, अब जनता पर क्रूड  के दाम बढ़ने की मार है, तो क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं बनता किवह एक्साइस ड्यूटी से कुछ समय के लिए राहत दे दे

जिस मलेशिया का उदाहरण देकर सरकार ने जीएसटी को सही बताया था, वहां भी अब जीएसटी खत्म हो गया है

हमारे पड़ोसी देशों पर भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर होता होगा, लेकिन कीमतें देखें तो श्रीलंका में एक लीटर पेट्रोल 49.60 रुपये में मिल रहा है, पाकिस्तान में 50.60 रुपये, नेपाल में 66.60 रुपये और बांग्लादेश में 68.40 रुपये प्रति लीटर है। जिस मलेशिया का उदाहरण देकर सरकार ने जीएसटी को सही बताया था, वहां भी अब जीएसटी खत्म हो गया है, साथ ही पेट्रोल के दामों को भी हर हफ्ते घटाने-बढ़ाने की जगह एक ही कीमत तय करने और जरूरत पड़ने पर सब्सिडी देने की व्यवस्था महातिर सरकार ने की है।

क्या मलेशिया के इस उदाहरण से मोदीजी कुछ नहीं सीखना चाहेंगे।

यह सही है कि धरती के नीचे तेल का भंडार सीमित है और उसका उपयोग सोच समझ कर होना चाहिए। इसकी कीमतों पर भी सरकार का अकेले नियंत्रण नहीं होता। लेकिन फिर इस पर राजनीति और जुमलेबाजी भी नहीं होनी चाहिए। सरकार को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुरक्षित, सुचारू और मजबूत बनाने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए, ताकि तेल की खपत थोड़ी कम हो और जनता को राहत मिले।

देशबन्धु का संपादकीय

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