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आधुनिकता की बीमारी है आत्महत्या
आधुनिकता की बीमारी है आत्महत्या

सहजता आदमी को ईमानदार भी बनाती है... अपने से ईमानदारी। इसमें अच्छा होना महत्वपूर्ण है, अच्छा दिखना नहीं।   

अतिथि लेखक
2018-10-16 16:47:05
ये सरकार भी विकास को "कुमकुम भाग्य" की तरह ही विकास को पेट में ही मार चुकी है
ये सरकार भी विकास को "कुमकुम भाग्य" की तरह ही विकास को पेट में ही मार चुकी है

विकास किसका - जनता का या कार्पोरेट घरानों का

उदय चे
2018-10-15 19:16:54
क्या आरएसएस का सचमुच ह्दय परिवर्तन हो गया है या नई पैकेजिंग में हिन्दुत्व
मी टू का दूरगामी प्रभाव है
मी टू का दूरगामी प्रभाव है

यौन अपराधों की संख्या रिपोर्ट होने वाले अपराधों की संख्या से कई कई गुना अधिक होती है क्योंकि इसमें पीड़िता न केवल शारीरिक मानसिक चोट ही भुगतती है ...

वीरेन्द्र जैन
2018-10-14 18:51:36
सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश  मूलतः सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं
सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश : मूलतः सभी धर्म पितृसत्तात्मक हैं

सबरीमाला मामले में उच्चतम न्यायालय ने ऐसे समूहों के बीच बहस को जन्म दिया है जो महिलाओं की समानता के हामी हैं और जो दकियानूसी परंपराओं और आचरण से ...

राम पुनियानी
2018-10-14 18:31:19
भागवत की कक्षा या आरएसएस के मेक-ओवर की कसरत
भागवत की कक्षा या आरएसएस के मेक-ओवर की कसरत

भागवत का यह दावा तो और भी हास्यास्पद है कि आरएसएस का राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, उसका किसी राजनीतिक दल के साथ कोई जुड़ाव नहीं है

राजेंद्र शर्मा
2018-10-14 17:53:12
पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समर्थक भाजपा किसान हितैषी हो ही नहीं सकती
पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समर्थक भाजपा किसान हितैषी हो ही नहीं सकती

दिल्ली के आकाओं को शक था कि गाँव से आ रहे किसान अपराधी भी होंगे

शेष नारायण सिंह
2018-10-14 13:57:08
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मीडिया पर प्रभाव ग़ायब हैं यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मीडिया पर प्रभाव, ग़ायब हैं यथार्थ के चित्र और यथार्थ की ख़बरें

यथार्थ की हत्या का तंत्र बन गया है सूचना क्रांति के नाम पर विकसित समूचा ढाँचा

जगदीश्वर चतुर्वेदी
2018-10-14 13:32:47
प्रकृति से खिलवाड़ और हमारे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ पर मैं भी   metoo
प्रकृति से खिलवाड़ और हमारे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ पर मैं भी ... ! #MeToo

प्रकृति से खिलवाड़ तो चिंताजनक है ही, हमारे लोकतंत्र के साथ हो रहा सतत खिलवाड़ इससे भी ज्यादा चिंता का विषय है।

अतिथि लेखक
2018-10-14 11:20:29
स्वामी सानंद ने कहा था “मेरी मौत के साथ मेरे अनशन का अंत होगा’ मोदी सरकार ने सच साबित करा दिया
स्वामी सानंद ने कहा था, “मेरी मौत के साथ मेरे अनशन का अंत होगा’, मोदी सरकार ने सच साबित करा दिया

अनशन के दौरान जीडी अग्रवाल ने कहा था, ‘हमने प्रधानमंत्री कार्यालय और जल संसाधन मंत्रालय को कई सारे पत्र लिखा था, लेकिन किसी ने भी जवाब देने की...

अतिथि लेखक
2018-10-13 10:24:07
भीड़ को इंसान के खून का प्यासा कौन बना रहा है
भीड़ को इंसान के खून का प्यासा कौन बना रहा है

जाति, धर्म, राष्ट्रवाद के मुद्दों पर उलझने की बजाए मेहनतकश आवाम की एकता और उसकी सत्ता स्थापित करने की तरफ बढ़ेंगे।

उदय चे
2018-10-13 00:25:22
test post
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हस्तक्षेप डेस्क
2018-10-12 23:40:15
कौन सेक्युलर है और कौन कम्युनल अब यह योगी या भाजपा तय करेगी
कौन सेक्युलर है और कौन कम्युनल अब यह योगी या भाजपा तय करेगी ?

योगी सरकार अखिलेश यादव पर टोटी चोरी का आरोप लगा दे तो अखिलेश यादव सेक्युलर और शिवपाल यादव को घर एलाट कर दे तो शिवपाल यादव कम्युनल !

मसीहुद्दीन संजरी
2018-10-12 23:44:53
आज लोहिया होते तो गैर भाजपावाद का आह्वान करते
आज लोहिया होते तो गैर भाजपावाद का आह्वान करते

लोहिया का पूरा चिंतन बराबरी के मूल्यबोधों में डूबा हुआ चिंतन है। बराबरी का यह लोकतांत्रिक विचार और स्त्री-पुरुष के बीच असमानता के मूल कारणों की ख...

अतिथि लेखक
2018-10-12 18:31:46
काश पं जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की वह बात भी मान ली होती
काश पं. जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की वह बात भी मान ली होती

स्मार्ट सिटी : अंधाधुंध शहरीकरण के चक्कर में कहीं हम अपने देश के गाँवों को तबाह न कर दें

शेष नारायण सिंह
2018-10-10 20:20:13
बहुजन समाज पार्टी [मायावती] और राजनीति की विडंबनाएं
बहुजन समाज पार्टी [मायावती] और राजनीति की विडंबनाएं

कांसीराम जी के निधन के बाद अब सुश्री मायावती के नेतृत्व में चल रही इस पार्टी के लक्ष्य और तौर तरीके बिल्कुल बदल गए हैं, इसलिए कहा जा सकता है यह ए...

वीरेन्द्र जैन
2018-10-10 13:53:00
भारतीय सभ्यता में पागलपन डर या भय नहीं उम्मीद पैदा करता है
भारतीय सभ्यता में पागलपन डर या भय नहीं, उम्मीद पैदा करता है

यूरोप में भी पुनर्जागरण काल के पहले पागलपन को बीमारी नहीं माना जाता था और इसलिये कोई पागलखाना नहीं था। भारत में तो अंग्रेजों के आने के पहले इस तर...

अतिथि लेखक
2018-10-10 12:58:40
पटाखा फिल्म से समझें सीपीएम के नेताओं को ज्योति बसु और सोमनाथ चटर्जी होने का मतलब क्यों समझ नहीं आता
'पटाखा' फिल्म से समझें सीपीएम के नेताओं को ज्योति बसु और सोमनाथ चटर्जी होने का मतलब क्यों समझ नहीं आता

सीपीएम के ये सभी बड़े नेता भारत में संसदीय जनतंत्र के राजनीतिक सत्य को समझते थे और इस पटल पर काम करते हुए कैसे आम जनता के हितों को आगे बढ़ाया जाए...

अरुण माहेश्वरी
2018-10-10 11:45:15