हम संघियों की नीचता के स्तर पर जाकर जश्न नहीं मना सकते, अटल जी के विचारों और व्यवहार से पूर्ण असहमति के साथ श्रद्धांजलि

भारत ने उनके प्रधानमंत्री काल में पहली बार 'विनिवेश मंत्रालय' देखा था जिसका काम सार्वजनिक उपक्रमों को निजी पूंजी के हाथ बेचना था, पहली बार 'संविधान समीक्षा आयोग' की बात हुई, ...

अतिथि लेखक
हम संघियों की नीचता के स्तर पर जाकर जश्न नहीं मना सकते, अटल जी के विचारों और व्यवहार से पूर्ण असहमति के साथ श्रद्धांजलि

मधुवन दत्त चतुर्वेदी

श्रद्धांजलि और समीक्षा को अलग रखकर बात करने की सलाह मिली है।

एक तरफ श्रद्धांजलि के साथ सराहना की बाढ़ आई हुई है और वह केवल मृत्यु पर मानवीय संवेदनाओं तक सीमित नहीं है बल्कि उनका महानायक के रूप में निरूपण भी है। दूसरी ओर से आने वाली श्रद्धांजलियों को मानवीय संवेदनाओं की सीमा में ही बांधने के लिए कहा जा रहा है।

हमने संसदीय इतिहास में अपना खास मुकाम हासिल करने, नम्र और प्रखर वक्ता होने, कवि-हृदय होने के साथ उनकी कई खूबियों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी और साथ ही वे चीज भी याद कीं जिन्हें जाने बिना उनके व्यक्तित्व का हीरोइज्म आने वाली पीढ़ियों को भ्रमित कर सकता है।

पूंजी से संचालित मीडिया समूहों के लिए यह व्यक्ति में देवत्व की स्थापना का अवसर यूँ ही नहीं है। भारत ने उनके प्रधानमंत्री काल में पहली बार 'विनिवेश मंत्रालय' देखा था जिसका काम सार्वजनिक उपक्रमों को निजी पूंजी के हाथ बेचना था, पहली बार 'संविधान समीक्षा आयोग' की बात हुई, पहली बार कर्मचारियों की 'पेंशन स्कीम' पर गाज गिरी, पहली बार भारत के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी मध्यस्थता में युद्ध विराम किया। वे पूंजी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक संरक्षकों में एक थे।

इस बात के बाबजूद कि भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका पर मीडिया से निःसंदेह तल्ख सवाल उठते हैं, फिर भी हम संघियों की नीचता के स्तर पर जाकर उस तरह जश्न नहीं मना सकते जैसे उन्होंने गांधी जी की हत्या से लेकर गौरी लंकेश तक मनाया। बेशक हम उनकी तरह गाली गलौज नहीं करेंगे हुतात्मा को जो हमारे भी बुजुर्ग थे, बेशक हम मिथ्या चरित्र हनन नहीं करेंगे उनकी तरह, लेकिन उनके व्यक्तित्व में देवत्व की स्थापना के प्रयासों पर चुप रहने की ऐतिहासिक भूल भी न करेंगे।

हम एक राजनेता के तौर पर उनका मूल्यांकन जरूर करेंगे। हमें उनके देहान्त पर मनुष्य होने के नाते पूरी संवेदना है। हमें उनका अनादर करने का विचार भी नहीं है, लेकिन जिस राजनीति के लिए वे जिये और जो इस देश के लोगों के लिए उन्होंने किया वह सही परिपेक्ष्य में सामने आना चाहिए। हम उन्हें पुनः श्रद्धांजलि देते हैं, उनके विचारों और व्यवहार से पूर्ण असहमति के साथ।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।