मोदी जैसे लफ़्फ़ाज़ के शासन के रहते भारत कभी भी मंदी से निकल नहीं पायेगा

अर्थ-व्यवस्था को मंदी से निकलना आने वाले कई सालों तक असंभव होगा...

हाइलाइट्स

मोदी के मूर्खतापूर्ण नोटबंदी के निर्णय ने लोगों के खुद पर विश्वास को भारी धक्का लगाया है। अपने ही पैसों को पाने के लिये बैंकों के सामने भिखारियों की तरह खड़े रहने के दर्दनाक अनुभवों ने बैंकों पर से भी उसकी आस्था की जड़ों को हिला दिया है।

अर्थ-व्यवस्था को मंदी से निकलना आने वाले कई सालों तक असंभव होगा

-अरुण माहेश्वरी

जिस बात का ख़तरा था और जिस पर हम नोटबंदी के पहले दिन से बार-बार कह रहे थे, वह अब शत-प्रतिशत सही साबित हो रहा है। इस बार बाजार में धन तेरस की बिक्री भी जितनी फीकी रही है, भारत के इतिहास में शायद कभी ऐसी नहीं रही।पिछले साल की तुलना में सोना-चाँदी की बिक्री में चालीस प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि मोदी सरकार ने दो लाख तक की खरीद पर पैन नंबर की बाध्यता को ख़त्म करके काला धन लगा कर जेवहरात खरीदने की पूरी छूट दे दी थी। आगे भी त्यौहारों का पूरा मौसम इसी प्रकार बीतता हुआ दिखाई दे रहा है।

अर्थ-व्यवस्था में मंदी के पीछे सबसे बड़ा कारण वह जन-मनोविज्ञान होता है, जो किसी भी वजह से एक ग्राहक और उपभोक्ता के रूप में आम आदमी की स्वाभाविक गतिविधियों को व्याहत करता है। एक बार लोगों के अंदर अपने जीवन और आमदनी की अनिश्चयता का विचार घर कर लें, उसके बाद बाजार को चंगा करना सबसे असंभव काम हो जाता है।निश्चिंत आदमी उधार लेकर भी ख़र्च करता है, लेकिन चिंताग्रस्त आदमी अपने बुरे समय की कल्पना करके पैसों पर कुंडली मार कर बैठ जाया करता है।

और अर्थ-व्यवस्था चलती है मूलत: बाजार में लोगों के उतरने से, उनकी खपत और उपभोग से।

मोदी के मूर्खतापूर्ण नोटबंदी के निर्णय ने लोगों के खुद पर विश्वास को भारी धक्का लगाया है। अपने ही पैसों को पाने के लिये बैंकों के सामने भिखारियों की तरह खड़े रहने के दर्दनाक अनुभवों ने बैंकों पर से भी उसकी आस्था की जड़ों को हिला दिया है।

और आज भी, नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार आम लोगों को रोज चोर घोषित किया करते हैं। आयकर के बारे में अपनी चरम अज्ञात का परिचय देते हुए रोज चीख़ते हैं कि सवा सौ करोड़ लोगों में मात्र चंद लाख लोग ही आयकर देते हैं। यह देश के प्रत्येक जन को अंदर से डरा दे रहा है। साधारण आदमी यह जानता है कि मोदी की तरह के शासकों के शासन की मार कभी भी बड़े-बड़े पूँजीपतियों, धन्ना सेठों पर नहीं पड़ती है। उनके तो ये सबसे क़रीबी दोस्त हैं जिनके निजी हवाई जहाज़ों में मौज करने के इनके पुराने अभ्यास हैं। ऐसे शासन का डंडा सिर्फ आम मासूम लोगों के सर पर ही पड़ा करता है।

इसीलिये आज किसी भी प्रकार का ख़र्च करने के पहले हर आदमी दस बार विचार कर रहा हैं।

नोटबंदी ने आम लोगों की घर में नगदी को जमा रखने की प्रवृत्ति को सबसे ज्यादा बल पहुँचाया हैं। आम आदमी समझता है कि किसी आपद-विपद के समय खुद के पास नगदी जमा पूँजी पर ही सबसे अधिक भरोसा किया जा सकता है। बैंकों और सोना-चाँदी पर भी लोगों की आस्था कम हो गई है।

हमें नहीं लगता कि इस प्रकार के एक कोरे लफ़्फ़ाज़ के शासन के रहते कभी भी भारत इस मंदी की स्थिति से निकल पायेगा। वैसे भी, भारत की अर्थ-व्यवस्था को अब अपनी पुरानी लय में लौटने में सालों-साल लग जायेंगे।

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