ये कैसा न्यू इंडिया! क्या देश में उबाल और बवाल के लिए मुगल, गाय, और दलित पात्रों का होना जरूरी है ?

जब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देनी वाली सरकारों के नाक के नीचे अनाथ और बेबस मासूमों के बचपन के साथ उनके अरमानों को रौंदा जा रहा है तो ये तथाकथित सेनायें और संगठन क्यों युद्ध विराम की मुद्रा में आ जा...

अतिथि लेखक
ये कैसा न्यू इंडिया! क्या देश में उबाल और बवाल के लिए मुगल, गाय, और दलित पात्रों का होना जरूरी है ?

जहाँ रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक।

आई. पी. ह्यूमन

प्रवक्ता-भौतिक विज्ञान

हल्द्वानी,नैनीताल

आई. पी. ह्यूमन  प्रवक्ता-भौतिक विज्ञान  हल्द्वानी,नैनीतालजब हम किसी फिल्म के उस दृष्य को देखते हैं जिसमें विलेन नायिका या फिल्म की किसी फिमेल एक्टर के साथ रेप की कोशिश करता है तो सिनेमा हॉल में दर्शकों का खून खौलने लगता है और उस विलेन को जिंदा ही दफन करने का क्रोध दर्शकों के रोम -रोम में उमड़ पड़ता है। कहानी आगे बढ़ती है और 2 या 3 घंटे की फिल्म में दोषी बलात्कारी को नायक खुद सजा देकर उस खलनायक का अंत कर देता है या कानून उसको कड़ी से कड़ी सजा देता है तब दर्शकों के चेहरे पर हंसी और खुशी लौट आती है और फिल्म समाप्त होने पर मुस्कराते हुए बाहर निकल जाते हैं।

मगर हम वो दर्शक हैं जो परदे के दृष्यों से क्रोधित भी हो जाते हैं और खुश भी। साथ ही ये भूल जाते हैं कि जो दृष्य 2 या 3 घंटे की रील में दिखाये जाते हैं उनसे भी घिनौनी और गिरी हुई हरकतें रीयल में देश और समाज में इस वक्त पल-पल घटित हो रही हैं तभी तो देश की सर्वोच्च अदालत को तल्ख शब्दों में कहना पडा कि ये क्या हो रहा है देश में-लेप्ट, राइट, सेंटर सब जगह रेप ही रेप हो रहे हैं। तब हमारा खून क्यों नहीं खौलता जब बालिका संरक्षण गृह में बच्चियों के साथ बलात्कार किया जाता है जो अभी बेटी और बेटा होने का फर्क तक नहीं समझ पायी हैं और खूनी भेडि़यों के पंजे का शिकार हो जाती हैं।

भारत में बलात्कार ने एक कुप्रथा का रूप धारण कर लिया है जो सभ्य समाज के ऊपर एक कलंक है। जिस देश में जानवर भी पूजनीय हैं, यहाँ तक कि सॉंपों तथा नागों को भी पूजा जाता है,उसी देश में आज बालिकायें और महिलाएं RAPE-TATE AND HATE की वस्तु बन गयी हैं। देवी के हजार रूपों में जो उपासना इस देश में होती है और कन्या पूजन भी किया जाता है वह क्या मात्र एक ढोंग है? अगर देवी के प्रति श्रद्धा भक्ति होती तो देवी के साक्षात् रूप के साथ ऐसा अपराध न होता जो देश को शर्मसार कर रहा है।

बिहार के मुजप्फरपुर बालिका संरक्षण गृह और यूपी के देवरिया का संरक्षण गृह राज्य सरकार के अधीन संस्थायें हैं जिनको समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित किया जाता है। सरकारी संस्थाओं में ऐसी वारदातें परोक्ष रूप से सरकारी संरक्षण को उजागर करती है।

मुजप्फरपुर बालिका गृह का संचालक और मास्टरमाइंड बृजेश ठाकुर बिहार के सामाजिक न्याय और समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति का करीबी है जिस कारण मंत्री पर इस्तीफे का दबाव बना था अंततः उनको मंत्री पद से हटना पडा। मंत्री के हटने से ही इस अपराध और जघन्य कांड का समाधान नहीं हो जाता जब तक इसमें लिप्त सभी दोषियों को कठोर दंड न मिले जाये।

हमारे देश की ये सबसे बडी़ विडंबना कही जायेगी कि नारी हमेशा ही शोषण और जुल्म का शिकार होती आ रही है। कभी द्रोपदी के रूप में चीर हरण, कभी सीता के रूप में कठिन अग्नि परीक्षा, कभी निर्भया के रूप में, कभी कठुआ और उन्नाव के रूप में और कभी साधु-संतों के आश्रम में और अब सरकारी संरक्षण गृहों में नारी को भोग की वस्तु के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। ये कैसा गठजोड़ बन गया है धर्म और राजनीति का जहाँ नीतियाँ जनकल्याण के लिए बननी चाहिए थी वहाँ अनैतिकता और कुकर्मों की पट कथायें लिखी जा रही है।

समाज की संवेदनहीनता भी शून्य होती नजर आ रही है क्योंकि पदमावती फिल्म के रिलीज होने से पहले देश भर में उबाल आ जाता है और शहर-शहर में बवाल खडा़ हो जाता है। रील की पट कथा के विरोध में देश में कई सेनायें, दल और संगठन सड़कों पर उतर आये यहाँ तक कि सरकार के मुखिया मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज चौहान भी खुले तौर पर फिल्म पदमावती के विरोध में उतर आये और पदमावती को राजमाता का दर्जा देने की घोषणा कर दी। इतिहास के पात्रों की इतनी चिंता और दुःख! और आँखों देखे शोषित हो रही बालिकाओं के प्रति चुप्पी क्या संकेत देता है?

जब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देनी वाली सरकारों के नाक के नीचे अनाथ और बेबस मासूमों के बचपन के साथ उनके अरमानों को रौंदा जा रहा है तो ये तथाकथित सेनायें और संगठन क्यों युद्ध विराम की मुद्रा में आ जाते हैं? क्या देश में उबाल और बवाल के लिए मुगल, गाय, और दलित पात्रों का होना जरूरी है ?

देश में कानूनों की कमी नहीं है कमी है तो लेागों की सोच और विकृत हो रही मानसिकता में बदलाव लाने की। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े चौंकाने वाले हैं जिस प्रकार दिनप्रतिदिन बलात्कार और यौन शोषण की घटनायें बड़ती जा रही हैं।हरियाणा में हर दिन 4 महिलाएं होती हैं गैंगरेप की शिकार, देश में छह वर्षों में बाल अपराध में लगभग 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।देखने वाली बात है कि बिहार की घटना पर मंत्री का तो इस्तीफा हो ही गया है,अब देवरिया की घटना पर योगी जी क्या कदम उठाते हैं?मुख्य मंत्री बनने के बाद योगी जी ने एक सभा में कहा था कि कानून शासकों का शासक होता है। अब देखना है कि वास्तव में कानून अपना काम करता है या शासकों के दबाव में आकर अपराधी कानून के शिकंजे से फिर बाहर निकल जाते है।अगर ऐसा होता है तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि रावण की लंका में रहकर भी सीता सुरक्षित थी और रामराज्य की कल्पना कर रहे देश में सुरक्षित नहीं!फिर क्यों दशहरे में हर साल रावण के पुतले जलाये जायें असली रावण तो स्वतंत्र घूम रहे है और कितने ही अभी विलों से बाहर निकलने बाकी हैं।।

आई. पी. ह्यूमन

प्रवक्ता-भौतिक विज्ञान

हल्द्वानी,नैनीताल

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