हम भी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए जब तालाब पर गए बाबा साहेब

एक महत्वपूर्ण सन्देश था लोकमान्य तिलक के सुपुत्र श्रीधर तिलक का जो जातिभेद उन्मूलन के काम में लगे थे तथा इसके लिए एक अलग संस्था बना कर काम कर रहे थे। ...

हाइलाइट्स

‘‘ अन्य लोगों की तरह हम भी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे। अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है। आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं। .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजारानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी। 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने ‘जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्रा जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा‘‘

‘‘जब पानी में आग लगी थी’’ : महाड सत्याग्रह के नब्बे साल - 3

- सुभाष गाताडे

महाड सत्याग्रह का दूसरा चरण पहले जितना ही क्रांतिकारी था। यह महसूस किया गया था कि  यूं तो कहने के लिए महाड सत्याग्रह के अन्तर्गत ‘चवदार तालाब’ पर पानी पीने या छूने के लिए दलितों पर लगायी गयी सामाजिक पाबंदी तोड़ दी गयी थी लेकिन अभीभी यह लड़ाई तो अधूरी ही रह गयी है।

घटना के दूसरे ही दिन महाड के सवर्णों ने ‘अछूतों‘ के स्पर्श से ‘अपवित्र‘ हो चुके चवदार तालाब के शुद्धीकरण को अंजाम दिया था। घटना के चन्द दिनों के बाद महाड नगरपालिका ने अपनी एक बैठक में अपने पहले प्रस्ताव को वापस लिया था। तथा महाड के चन्द सवर्णों ने अदालत में जाकर यह दरखास्त दी थी कि यह ‘चवदार तालाब’ दरअसल ‘चौधरी तालाब’ है और यह कोई सार्वजनिक स्थान नहीं है। गौरतलब है कि अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार की थी और फैसले के लिए अगली तारीख मुकरर की थी।

महाड सत्याग्रह में शामिल हो रहे लोगों के लिए सूचना

25 दिसम्बर 1927 को महाड से शुरू हो रहे सत्याग्रह में शामिल होनेवाले सभी लोगों के लिए विनम्रतापूर्वक यह सूचना दी जाती है कि वे अपने साथ थाली, लोटा, कंबल और तीन दिन पूरी पड़नेवाली भोजनसामग्री अवश्य लाएं। हम लोग वहां भोजन का इंतज़ाम करनेवाले हैं, लेकिन हरेक अपनी व्यवस्था कर सके तो अच्छा रहेगा। डा अम्बेडकर और सत्याग्रह कमेटी के अन्य लोग मुंबई से 24 दिसम्बर को मुंबई से पानी वाले जहाज से निकलनेवाले हैं। जो लोग उनके साथ निकलना चाहते हैं वे अपने आने जाने के खर्चे के लिए 5 रूपए की रकम बहिष्क्रत हितकारिणी सभा के दफतर में पहुंचा दें ताकि उनके लिए स्वतंत्रा बोट का इन्तजाम किया जा सके।..जो लोग कमेटी के सदस्यों के साथ नहीं पहुंच रहे हैं वह दासगांव पहुंच जाएं।

महाड के सत्याग्रह में भारी तादाद में लोग इकटठा होने वाले हैं। इस पूरी भीड़ में अपने साथियों को पहचानने के लिए सत्याग्रह में शामिल हो रहे स्वयंसेवकों को चाहिए कि वह बहिष्क्रत हितकारिणी सभा का बिल्ला प्रदर्शित करे। जिनके सीने पर सभा के नाम का बिल्ला नहीं होगा उनके हिफाजत की या अन्य किसी भी किस्म की जिम्मेदारी सत्याग्रह कमेटी के पास नहीं रहेगी। इस बिल्ले की कीमत सिर्फ दो आना रखी गयी है और वह बहिष्क्रत हितकारिणी सभा के दफतर में खरीदा जा सकेगा।

आप का

सिताराम नामदेव शिवतरकर

सेक्रेटरी सत्याग्रह कमेटी

(महाड सत्याग्रह के दूसरे चरण के दौरान में प्रकाशित मराठी पर्चे का अनुवाद)

तय किया गया कि 25-26 दिसम्बर को महाड सत्याग्रह के अगले चरण को अंजाम दिया जाएगा। उसके लिए हैण्डबिल प्रकाशित किये गये तथा उसकी तैयारी के लिए जगह जगह सम्मेलन भी आयोजित किये गये। बम्बई में इसी के लिए आयोजित एक सभा में 3 जुलाई 1927 को बाबासाहब ने कहा ‘‘.. सत्याग्रह का अर्थ लड़ाई। लेकिन यह लड़ाई तलवार, बंदूकों, तोप तथा बमगोलों से नहीं करनी है बल्कि हथियारों के बिना करनी है। जिस तरह पतुआखली, वैकोम जैसे स्थानों पर लोगों ने सत्याग्रह किया उसी तरह महाड में हमें सत्याग्रह करना है। इस दौरान सम्भव है कि शान्तिभंग के नाम पर सरकार हमें जेल में डालने के लिए तैयार हो इसलिये जेल जाने के लिए भी हमें तैयार रहना होगा।.. सत्याग्रह के लिए हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो निर्भीक तथा स्वाभिमानी हों। अस्पृश्यता यह अपने देह पर लगा कलंक है और इसे मिटाने के लिए जो प्रतिबद्ध हैं वही लोग सत्याग्रह के लिए अपने नाम दर्ज करा दें। ..‘‘

27 नवम्बर के अपने लेख में बाबासाहब ने सरकार को यहभी चेतावनी दी कि उसके साथ न्याय के रास्ते में अगर बाधाएं खड़ी की गयीं तो वह अपनी समस्या को दुनिया के सामने रखने में भी नहीं हिचकेगा। ‘‘.. सरकार कितने लोगों को जेल भेजेगी ? कितने दिन जेल में रखेगी ?.. शान्तिभंग के नाम पर अगर सरकार हमारे न्याय अधिकारों के आड़े आएगी तो हम सुधरे हुए देशों का जो राष्ट्रसंघ बना है उसके पास फिर्याद करके सरकार के अन्यायी रूख को बेपर्द करेंगे।..

25 दिसम्बर को चार बजे हजारों जनसमूह की भीड के बीच सम्मेलन की शुरूआत हुई। प्रस्तुत सम्मेलन के लिए महज महाड और उसके आसपास से ही नहीं बल्कि समूचे महाराष्ट्र से जातिभेद का उन्मूलन में रूचि रखनेवाले लोग जुटे थे। समूचे मण्डप में अलग अलग नारे लिख कर लगाये गये थे। गांधी के नेतृत्व के बारे में दलित आन्दोलन में तब तक व्याप्त मोह की झलक इस बात से भी मिल रही थी कि वहां महज एक ही तस्वीर लटकी थी और वह थी गांधी की। सम्मेलन के शुरूआत में उन बधाई सन्देशों को पढ़ कर सुनाया गया जो जगह जगह से आये थे। इसमें एक महत्वपूर्ण सन्देश था लोकमान्य तिलक के सुपुत्रा श्रीधर तिलक का जो जातिभेद उन्मूलन के काम में लगे थे तथा इसके लिए एक अलग संस्था बना कर काम कर रहे थे।

सम्मेलन के अपने शुरूआती वक्तव्य में बाबासाहेब ने प्रस्तुत सत्याग्रह परिषद का उद्देश्य स्पष्ट किया।

‘‘ अन्य लोगों की तरह हमभी इन्सान है इस बात को साबित करने के लिए हम तालाब पर जाएंगे। अर्थात यह सभा समता संग्राम की शुरूआत करने के लिए ही बुलायी गयी है। आज की इस सभा और 5 मई 1789 को फ्रांसीसी लोगों की क्रांतिकारी राष्ट्रीय सभा में बहुत समानताएं हैं। .. इस राष्ट्रीय सभा ने राजारानी को सूली पर चढ़ाया था, सम्पन्न तबकों के लिए जीना मुश्किल कर दिया था, उनकी सम्पत्ति जब्त की थी। 15 साल से ज्यादा समय तक समूचे यूरोप में इसने अराजकता पैदा की थी ऐसा इस पर आरोप लगता है। मेरे खयाल से ऐसे लोगों को इस सभा का वास्तविक निहितार्थ समझ नहीं आया।.. इसी सभा ने ‘जन्मजात मानवी अधिकारों को घोषणापत्रा जारी किया था.. इसने महज फ्रान्स में ही क्रान्ति को अंजाम नहीं दिया बल्कि समूची दुनिया में एक क्रांति को जनम दिया ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा‘‘

उन्होंने अपील की थी इस सभा को फ्रेंच राष्ट्रीय सभा का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए..‘‘ हिन्दुओं में व्याप्त वर्णव्यवस्था ने किस तरह विषमता और विघटन के बीज बोये हैं इस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘ समानता के व्यवहार के बिना प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं हो पाता उसी तरह समानता के व्यवहार के बिना इन गुणों का सही इस्तेमाल भी नहीं हो पाता।  एक तरफ से देखें तो हिन्दु समाज में व्याप्त असमानता व्यक्ति का विकास रोक कर समाज को भी कुंठित करती है और दूसरी तरफ यही असमानता व्यक्ति में संचित शक्ति का समाज के लिए उचित इस्तेमाल नहीं होने देती। ..‘‘

सभी मानवों की जनम के साथ बराबरी की घोषणा करता हुआ मानवी हकों का एक ऐलाननामा भी सभा में जारी हुआ।  सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गये जिसमें जातिभेद के कायम होने के चलते स्थापित विषमता की भर्त्सना की गयी तथा यहभी मांग की गयी कि धर्माधिकारी पद पर लोगों की तरफ से नियुक्ति हो। इसमें से दूसरा प्रस्ताव मनुस्मृतिदहन का था जिसे सहस्त्राबुद्धे नामक एक ब्राहमण जाति के सामाजिक कार्यकर्ता ने प्रस्तुत किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘शूद्र जाति को अपमानित करनेवाली उसकी प्रगति को रोकनेवाली उसके आत्मबल को नष्ट कर उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को मजबूती देनेवाली मनुस्मृति के श्लोकों को देखते हुए .. ऐसे जनद्रोही और इन्सानविरोधी ग्रंथ को हम आज आग के हवाले कर रहे हैं।’’

शाम को सभास्थान पर पहले से तैयार किये गये एक यज्ञकुण्ड में मनुस्मृति को आग के हवाले किया गया। यज्ञकुण्ड के आसपास ‘अस्पृश्यता नष्ट करो’ ‘ पुरोहितशाही का विध्वंस करो’ जैसे बैनर लगे थे। सभा के दूसरे दिन स्थानीय कलेक्टर ने अदालत की ओर से जारी उस स्थगनादेश की प्रतियां सम्मेलन को सौंपी जिसमें कहा गया था कि ‘ फिलहाल तालाब पर यथास्थिति बनायी रखी जाय अर्थात उसमें दलितों को वहां का पानी छूने से मना किया गया था। निश्चित ही वह एक बेहद उलझन का समय था। एक तरफ सत्याग्रहियों का विशाल जनसमूह था जो ‘चवदार तालाब पर सत्याग्रह के लिए तैयार था और जिसके लिए जेल जाने के लिए भी तैयार था दूसरी तरफ था सरकार का वह आदेश जिसके तहत इस पर पाबंदी लगा दी गयी थी। रात भर विचारविमर्श चलता रहा। अन्त में सत्याग्रह स्थगित करने का कटु फैसला लिया गया। 27 दिसम्बर के अपने भाषण में डा आम्बेडकर ने कहा कि ‘‘ मुझे आपकी ताकत का अन्दाजा है। लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग समय स्थान देख कर किया जाना चाहिये ऐसा मुझे लगता है। .. सवर्णों ने सब तरफ से दमन का चक्र चलाया है। व्यापारियों ने बाजार बन्द किया है। भूस्वामी ( खोत) खेत नहीं दे रहे हैं। किसान लोग जानवरों को उठा ले जा रहे हैं।’’ इसके बाद बाबासाहेब ने महिलाओं विशेषकर सम्बोधित करते हुए लम्बा वक्तव्य दिया जिसमें उन्हें सामाजिक समता लाने की लड़ाई में जोर से आगे आने की अपील की गयी थी।

‘‘जब पानी में आग लगी थी’’ : महाड सत्याग्रह के नब्बे साल"

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