सलाम मशाल, मशालें बुझा नहीं करतीं। अँधेरे के खिलाफ जंग जारी रहेगी। इंसान की मजबूरी है कि उसे रौशनी बेहद पंसद है।

इसी हमास ने गाजा में वाम ताकतों का हाल ही में क्या हश्र किया बताने की जरूरत नहीं। इन्हीं की प्रजाति तालिबान ने काबुल में कामरेड नजीबुल्लाह को फांसी देकर उसके जननांग काट कर जीप से बाँध कर सड़क पर घसीटा...

हाइलाइट्स

मशाल खान इस सिलसिले में न पहला है न आख़िरी, पूरी दुनिया में मशालों ने अपना खून बहाया है।

मशाल खान : इस्लाम के अंदरूनी संघर्ष का शहीद

शमशाद इलाही शम्स

मानवाधिकारकर्मी, बुद्धिवादी, छात्र नेता, जन संचार विषय के छात्र मशाल खान की हत्या भीड़ ने नहीं की, मारने वाले भी उसी वली खान यूनिवर्सिटी (मरदान) के छात्र थे।

एक आरोपी इमरान खान जैसे चिकने चुपड़े नेता की पार्टी का कार्यकर्ता था।

मारने वाले किसी वक्ती तैश में, गुस्से में नहीं थे बल्कि अपना अजीम मज़हबी फ़र्ज़ अदा कर रहे थे।

मशाल को भी दो गोलियां दागी गयीं। इस्लामी समाज का यह अंदरूनी गृह युद्ध इतना ही पुराना है जितना इस्लाम।

इक्कीसवीं सदी में सातवीं सदी के जुनून की हिफाज़त और उसे मज़बूत बनाने का काम बहुत जोरों से हुआ है, जिसके नतीजे में कभी सलमान तासीर तो कभी भट्टी साहब तो कभी मशाल खान को अपनी जान की कीमत देनी पड़ती है। धर्म और विज्ञान साथ नहीं चल सकते। धर्म रुका हुआ सडांध भरा रुका हुआ पानी है, कभी दरिया था जो अब नाले से भी बदतर है। उससे होकर गुजरा नहीं जा सकता। उस पर से छलांग लगानी ही होगी।

स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक सोच की यह पूर्व शर्त है कि वह विभिन्न धर्मों की सडांध मारती नालियों पर से छलांग मारे।

जाहिर है ऐसी तमाम कोशिशें इंसान करता रहा है, क्योंकि इंसान मूलत: आज़ाद ख्याल है। जब ऐसे इंसान इन गंदे नालों को पार करते हैं तब नाले में पड़ी हुई ताकतें उन्हें अपनी तरफ खींचने की कोशिश स्वाभाविक रूप से करती ही हैं। इनके पास नाला कूदने वालों के लिए ज़िन्दगी का कोई तसव्वुर नहीं है, ये सिर्फ उन्हें मौत ही दे सकती हैं। कीचड़ भरी इन नालियों के पास बहुत ताकत है, अतीत का असला भी है और उनके मौदूदी, जाकिर नायक, ज़ैद हामिद, जैसे नेताओं की मतान्ध फ़ौज भी है जिन्हें इस दौर की हवा से अपने सातवीं सदी के चिराग के बुझने की फ़िक्र हर दम सताती रहती है।

मशाल खान इस सिलसिले में न पहला है न आख़िरी, पूरी दुनिया में मशालों ने अपना खून बहाया है।

सातवीं सदी की चुम्बकीय शक्ति और आज के दौर के विचार निश्चय ही एक अंतर्विरोध है। आमतौर से देखा जाता है कि बदलाव वाली प्रगतिशील ताकतें इस अंतर्विरोध को नज़र अंदाज़ करके नकाब के पक्ष में खासकर पश्चिमी देशों में लाम बंद हो जाती हैं।

नकाब का पक्ष और कनाडा, अमेरिका एंव यूरोपीय देशों की हकुमतों द्वारा फैलाया जाने वाला इस्लामोफोबिया का विरोध करते हुए उन्हें नकाब परस्त वे ताकतें ही मिलती हैं जिनके भाई बन्दों ने मशाल की हत्या की है।

इस्लामोफोबिया के दो रूप हैं, एक शासक वर्ग द्वारा फैलाया जाने वाला विचार जिसके तहत वह अपनी जन विरोधी नीतियों को जारी रख अपनी जनता पर युद्ध का बोझ डाल देता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, खुद मुसलमानों के समाज में अपने ही लिबरल तबके के विरुद्ध फैलाया जाने वाला आतंक।

इस आतंक और इस सातवी सदी की नाली पर जुबान बंद करके सिर्फ शासक वर्ग द्वारा फैलाये जाने वाले इस्लामोफोबिया से लड़ा नहीं जा सकता। नकाब के पक्ष में खड़े होकर वाम शक्तियां मुसलमान समुदाय के लिबरल तबके को पहले ही कड़ा संदेश दे देती हैं, जबकि जरूरत इसी तबके के डर को भगाने की है, उसे ही लाम बंद करने की जरूरत है। यही तबका किसी बुनियादी लड़ाई में डट कर साथ दे सकता है, नकाब और गाज़ा पर हमले के दौरान इकठ्ठा हुई ताकतें दरअसल धार्मिक ताकतें ही हैं, ये सड़ांध मारती हुई नालियों के ही बाशिंदे हैं। आज कमजोर हैं, अकेले सड़क पर नहीं आ सकते, इसलिए जब तुम उन्हें बुलाते हो तब वह आते हैं। कल जब वे ताकतवर होंगे तब सबसे पहले इनका निशाना नाली की छलांग लगाने वालों को ही पकड़ना होगा।

वे इरानी क्रांति के बाद तुदेह पार्टी के नेता नुरुद्दीन किया नूरी को जेल में डालते हैं और उसकी मौत नज़रबंदी में होती है। सैकड़ों इरानी कम्युनिस्टों को फांसी पर खुमैनी ने ही चढ़ाया था।

इसी हमास ने गाजा में वाम ताकतों का हाल ही में क्या हश्र किया है, बताने की जरूरत नहीं इन्हीं की प्रजाति तालिबान ने काबुल में कामरेड नजीबुल्लाह को फांसी देकर उसके जनांग काट कर जीप से बाँध कर सड़क पर घसीटा था।

मशाल खान जैसे लोग छलांगे मारेंगे जरूर, यह स्वभाविक है। अस्वाभाविक यह है कि इस्लामोफोबिया के विरुद्ध और नकाब के पक्ष में खड़ी होने वाली ताकतें मशाल खान की बर्बर हत्या के विरोध में न कोई जलसा करेंगी न कोई प्रदर्शन। शायद वे जानते हैं कि ऐसे मौके पर उन्हें कोई हिजाबी पलटन समर्थन नहीं देगी। यह हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।

सलाम मशाल, मशालें बुझा नहीं करतीं, इस मशाल में फिर कोई अपने लहू का तेल डालेगा, दोभालकर, कुलबर्गी, पनेसर जैसे पहले ही डाल चुके हैं। अँधेरे के खिलाफ जंग जारी रहेगी। इंसान की मजबूरी है कि उसे रौशनी बेहद पंसद है।

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