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Dr. Ram Puniyani

भारत में जाति प्रथा का उदय, जानिए सत्य क्या है

जाति प्रथा का उदय भारत में

राजनीति की बलिवेदी पर इतिहास की बलिशीर्षक डॉ. राम पुनियानी का यह आलेख हस्तक्षेप पर मूलतः 27 अक्तूबर 2014 को प्रकाशित हुआ था। राम पुनियानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में प्रोफेसर थे, और उन्होंने दिसंबर 2004 में भारत में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए पूरे समय काम करने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। वह पिछले दो दशकों से मानवाधिकार गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। वह ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म और अनहद जैसी विभिन्न धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक पहलों से जुड़े हैं। डॉ. राम पुनियानी का लेख भारत में जाति व्यवस्था के उदय के कारण, भारत में जाति व्यवस्था का इतिहास (Caste system in India), भारत में जाति का आधार क्या है, भारत में जाति प्रथा कब शुरू हुई, भारतीय राज्य व्यवस्था में जाति व्यवस्था के प्रभाव आदि विषयों पर तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेख का संपादित रूप का पुनर्प्रकाशन –

जाति प्रथा का उदय कैसे हुआ | How did the caste system rise

भारत में सामाजिक न्याय की राह में जातिप्रथा सबसे बड़ी और सबसे पुरानी बाधा रही है। यह प्रथा अभी भी सामाजिक प्रगति को बाधित कर रही है। जाति प्रथा का उदय कैसे, कब और क्यों हुआ, इस संबंध में कई अलग-अलग सिद्धांत हैं। इसी श्रृंखला में सबसे ताजा प्रयास है जातिप्रथा के लिए मुस्लिम बादशाहों के आक्रमण को दोषी बताना। आरएसएस के तीन विचारकों ने अलग-अलग किताबों में यह तर्क दिया है कि मध्यकाल में मुसलमान राजाओं और सामंतों के अत्याचारों के कारण अछूत प्रथा और नीची जातियों की अवधारणा ने जन्म लिया। ये पुस्तकें हैं ‘हिंदू चर्मकार जाति’, ‘हिंदू खटीक जाति’ व ‘हिंदू वाल्मीकि जाति’।

संघ के नेताओं का दावा है कि हिंदू धर्म में इन जातियों का कोई अस्तित्व नहीं था और वे, विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों के कारण अस्तित्व में आयीं। भैय्यू जी जोशी, जो कि आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता हैं, के अनुसार, हिंदू धर्म ग्रंथों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि शूद्र, अछूत हैं। मध्यकाल में ‘इस्लामिक’ अत्याचारों के कारण अछूत और दलित की अवधारणाएं अस्तित्व में आईं।

वे लिखते हैं, ‘‘चावरवंशीय क्षत्रियों के हिंदू स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के लिए अरब से आए विदेशी हमलावरों, मुस्लिम शासकों और गौमांस भक्षकों ने उन्हें गायों को मारने, उनकी खाल उतारने और उनकी देह को आबादी से दूर फेंकने के घृणास्पद कार्य को करने के लिए मजबूर किया। इस तरह, विदेशी आक्रांताओं ने चर्म-कर्म करने वाली एक जाति का निर्माण किया। वे अपने धर्म पर गर्व करने वाले हिंदू बंदियों को सजा के स्वरूप यह काम करने के लिए मजबूर करते थे।’’

सत्य क्या है ? वैदिक काल में जाति व्यवस्था

सत्य इसके ठीक उलट है। जातिप्रथा की नींव मुसलमानों के देश में आने से कई सदियों पहले रख दी गई थी और अछूत प्रथा, जाति व्यवस्था का अभिन्न अंग थी। आर्य स्वयं को श्रेष्ठ समझते थे और गैर-आर्यों को कृष्णवर्णेय (काले रंग वाले) व अनासा (बिना नाक वाले) कहते थे। चूंकि गैर-आर्य लिंग की पूजा करते थे इसलिए उन्हें गैर-मनुष्य या अमानुष्य भी कहा जाता था (ऋग्वेद, 10वां अध्याय, सूक्त 22.9)। ऋग्वेद और मनुस्मृति में कई स्थानों पर यह कहा गया है कि नीची जातियों के लोगों को ऊँची जातियों के व्यक्तियों के नजदीक आना भी मना था और उन्हें गांवों के बाहर रहने पर मजबूर किया जाता था।  यह कहने का यह अर्थ नहीं है कि ऋग्वेद के समय जाति प्रथा पूरी तरह अस्तित्व में आ चुकी थी। परंतु तब भी समाज को चार वर्णों में विभाजित किया जाता था और मनुस्मृति का काल आते-आते तक यह विभाजन कठोर जाति व्यवस्था में बदल गया।

जाति व्यवस्था में अछूत प्रथा का इतिहास | History of untouchability in caste system

जाति व्यवस्था में अछूत प्रथा का जुड़ाव लगभग पहली सदी ईस्वी में हुआ। मनुस्मृति, जो दूसरी-तीसरी सदी में लिखी गई है, में उन घृणास्पद सामाजिक प्रथाओं का वर्णन है जिन्हें आततायी जातियां, दमित जातियों पर लादती थीं।

मनुस्मृति के लिखे जाने के लगभग 1000 साल बाद अर्थात 11वीं सदी ईस्वी में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण (First Muslim invasion of India) हुआ। और यूरोपीय देशों ने तो भारत पर 17वीं-18वीं शताब्दियों में कब्जा करना शुरू किया। इससे यह स्पष्ट है कि जाति प्रथा के लिए विदेशी हमलावरों को दोशी ठहराना कितना बेमानी है।

समय के साथ जाति प्रथा वंशानुगत बन गई। सामाजिक अंतर्संबंधों और वैवाहिक संबंधों का निर्धारण जाति प्रथा से होने लगा। धीरे-धीरे जातिगत ऊँचनीच और कड़ी होती गई। शूद्रों को समाज से बाहर कर दिया गया और ऊँची जातियों के लोगों का उनके साथ खानपान या वैवाहिक संबंध बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। जाति प्रथा को बनाए रखने के लिए ‘पवित्रता’ और ‘अपवित्रता’ की अवधारणाओं को कड़ाई से लागू किया जाने लगा। शूद्र, अछूत बन गए। इसी कठोर सामाजिक विभाजन का वर्णन मनु के ‘मानव धर्मशास्त्र’ में किया गया है।

गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय के जाति प्रथा पर विचार

आरएसएस के एक प्रमुख विचारक गोलवलकर ने जाति प्रथा का बचाव दूसरे तरीके से किया।

‘‘अगर किसी विकसित समाज को यह एहसास हो जाए कि समाज में व्याप्त अंतर, वैज्ञानिक सामाजिक ढांचे पर आधारित हैं और वे समाजरूपी शरीर के अलग-अलग अंगों की ओर संकेत करते हैं तो सामाजिक विविधता, कोई दाग नहीं रह जायेगी।’’ (आर्गनाइजर, 1 दिसंबर 1952, पृष्ठ 7)।

संघ परिवार के एक अन्य प्रमुख विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा,

‘‘हमारी अवधारणा यह है कि चार जातियां (वर्ण) दरअसल, विराट पुरूष के विभिन्न अंग हैं…ये अंग न केवल एक दूसरे के पूरक हैं वरन् उनमें मूल एकता भी है। उनके हित, पहचान और संबद्धता एक ही हैं…अगर इस विचार को जिंदा नहीं रखा गया तो जातियां एक दूसरे की पूरक होने की बजाए कटुता और संघर्ष का कारण बन सकती हैं। परंतु यह विरूपण होगा’’

(दीनदयाल उपाध्याय, इंटीग्रल हृयूमेनिजम, नई दिल्ली, भारतीय जनसंघ, 1965, पृष्ठ 43)।

जाति प्रथा का विरोध करने के लिए हुए सामाजिक संघर्ष और इस प्रथा के अत्याचारों से मुक्ति पाने की कोशिश को अंबेडकर ने क्रांति और प्रति-क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया है। वे ‘मुस्लिम-पूर्व’ काल को तीन भागों में बांटते हैं (अ) ब्राह्मणवाद (वैदिक काल)। (ब) बौद्धकाल जिसमें मगध-मौर्य साम्राज्यों का उदय हुआ और जिसमें जातिगत असमानताओं को नकारा गया। इस काल को वे क्रांति का काल कहते हैं। (स) ‘हिंदू धर्म’ या प्रति क्रांति का काल, जिसमें ब्राह्मणों का प्रभुत्व फिर से कायम हुआ और जातिगत ऊँचनीच मजबूत हुई।

मुस्लिम शासकों के आगमन के बहुत पहले से भारत में शूद्रों को अछूत माना जाता था और वे समाज के सबसे दमित और शोषित वर्ग में शामिल थे। उत्तर-वैदिक गुप्तकाल के बाद से अछूत प्रथा और जाति व्यवस्था की क्रूरता और उसकी कठोरता में वृद्धि होती गई। बाद में भक्ति जैसे सामाजिक आंदोलनों ने प्रत्यक्ष रूप से और सूफी आंदोलन ने अप्रत्यक्ष रूप से कुछ हद तक जातिगत दमन और अछूत प्रथा की कठोरता में कमी लाई।

संघ परिवार जो कर रहा है, उसका उद्देश्य सच को दुनिया से छुपाना और अपने राजनैतिक एजेण्डे को लागू करना है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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