ललित सुरजन अजातशत्रु भी थे और आजानुबाहु भी

ललित जी बहुत ही विनम्र और दृढ़ व्यक्ति थे अपनी सच्चाई से कभी समझौता नहीं किया। कई बार बड़ी कीमतें भी चुकाईं। अखबार चलाने में आर्थिक तंगी भी आई और अन्य परेशानियां भी हुईं लेकिन यह अजातशत्रु कभी झुका नहीं।

Lalit Surjan is now immortal

ललित सुरजन अब अमर हो गए

During lockdown, it was found out that Lalit Surjan had cancer

ललित सुरजन जी पंचतत्व में विलीन हो गए। छतीसगढ़ सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान से उनको अंतिम विदाई दी। कोरोना के बाद के लॉकडाउन के दौरान पता लगा था कि उनको कैंसर था। रायपुर में थे, वहां कैंसर के इलाज की उतनी अच्छी व्यवस्था नहीं थी। उनके बच्चे उनको विशेष विमान से दिल्ली लाये। कैंसर का इलाज सफलतापूर्वक चल रहा था। उनके रोजमर्रा के कामकाज को देख कर कोई नहीं कह सकता था की वे बीमार हैं। लेकिन काल को कुछ और मंज़ूर था और उनको ब्रेन हैमरेज हो गया। और वे अपनी अनंत की यात्रा पर चले गए।

74 साल की उम्र भी जाने की कोई उम्र है लेकिन उन्होंने हमको अलविदा कह दिया। ओहदे के हिसाब से वे देशबन्धु अखबार के प्रधान संपादक थे लेकिन इसके अलावा बहुत कुछ थे। वे एक सम्मानित कवि व लेखक थे। सामाजिक मुद्दों पर बेबाक राय रखते थे। दिल्ली में अपने अंतिम महीनों में वे लेखन के काम में लगे रहे। फेसबुक पर उनकी नियमित मौजूदगी थी।

अन्याय के खिलाफ उनकी कलम हमेशा चलती थी। अपने अखबार के सहकर्मियों को वे सच्चाई के साथ लिखने के लिए प्रेरित करते रहते थी। सत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अद्वितीय थी। किसी भी सही काम के लिए आगे आकर शामिल होना उनकी फितरत थी। इसलिए उनके जानने वाले उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता भी मानते हैं। वे साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्वशांति से सम्बंधित मुद्दों पर हमेशा खुलकर बात करते थे। दुनिया के कई देशों की उन्होंने यात्राएं की थीं। विश्व के देशों की संस्कृति और रीति-रिवाजों की जानकारी रखने का उनको बहुत शौक़ था। उनके स्तर का यात्रा वृत्तान्त लिखने वाला मैंने दूसरा नहीं देखा। जहां भी जाते थे वहां के बारे में लिखते जरूर थे।

उनके यात्रा वृत्तान्त पढ़कर लगता था कि पाठक वहीं कहीं मौजूद है। 2013 में नार्वे में संसद के चुनाव होने वाले थे। इत्तिफाक से उन्हीं दिनों में नार्वे की राजधानी ओस्लो जा रहा था। उन्होंने मुझे एक शोध करने वाले विद्वान का सन्दर्भ दिया। जब मैं वहां गया तो चुनाव की कवरेज तो मैंने अपने मित्र शरद आलोक के साथ की लेकिन ओस्लो और बर्गेन के विद्वानों के बीच उनके उस शोधार्थी मित्र जैकबसन ने सम्मान दिलवाया। मुझे याद है किसी भी देश या संस्कृति के बारे में उनसे बात करने पर कुछ न कुछ नया ज़रूर मिल जाता था।

Mayaram Surjan was considered the guide of journalism in Madhya Pradesh

ललित सुरजन एक आला और नफीस इंसान थे। देशबन्धु अखबार के संस्थापक स्व मायाराम सुरजन के बड़े बेटे थे।

मायाराम जी मध्यप्रदेश के नेताओं और पत्रकारों के बीच बाबू जी के रूप में पहचाने जाते थे। वे मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के मार्गदर्शक माने जाते थे उन्होंने मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन को बहुत ही सम्मान दिलवाया। वे नए लेखकों के लिए खास शिविर आयोजित करते थे और उनको अवसर देते थे। बाद में उनमें से बहुत सारे लेखक बहुत बड़े साहित्यकार बने, उनमें से एक महान साहित्यकार प्रोफेसर काशीनाथ सिंह भी हैं।

‘अपना मोर्चा’ जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह ने मुझे एक बार बताया कि मायाराम जी ने उनको बहुत शुरुआती दौर में मंच दिया था। महान लेखक हरिशंकर परसाई जी से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे।

स्व. मायाराम जी के सारे सद्गुण ललित जी में भी थी। जब भी परसाई जी के बारे में उनसे बात की तो अपनेपन की आभा आसपास देखी जा सकती थी।

रायपुर में उन्होंने शिक्षा ली थी। छात्र के रूप में ही उन्होंने कुछ मित्रों के साथ मिलकर कई साहित्यिक सम्मेलनों का आयोजन किया था। उन्होंने 1961 में देशबन्धु में एक जूनियर पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। उनको साफ बता दिया गया था कि अखबार के संस्थापक के बेटे होने का कोई विशेष लाभ नहीं होगा, अपना रास्ता खुद तय करना होगा, अपना सम्मान कमाना होगा, देशबंधु केवल एक अवसर है, एक आदरणीय मंच है, वहां अपना स्थान अपनी मेहनत के बल पर बनाना होगा।

ललित सुरजन ने वह सब काम किया जो एक नए रिपोर्टर को करना होता है। प्रबंधन का काम भी सीखा और बसों से लेकर बैलगाड़ी तक में यात्रा करके देशबन्धु को सतत आगे बढ़ाते रहे। और अपने महान पिता के सही अर्थों में वारिस बने।

पिछले साठ साल की मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हर राजनीतिक गतिविधि को उन्होंने एक पत्रकार के रूप में देखा, अपने स्वर्गीय पिता जी को आदर्श माना और कभी भी राजनीतिक नेताओं के सामने सर नहीं झुकाया। अपनी मृत्यु के पहले उन्होंने एक सीरीज लिखी। हर गुरुवार को देशबन्धु में उनका मुख्य आलेख होता था। पिछले कई महीनों से यह सीरीज चल रही है। जिस दिन उनकी मृत्यु की खबर अखबार के मुखपृष्ठ पर छपी, उस दिन भी सम्पादकीय पृष्ठ पर उनका मुख्य लेख था।

मध्यप्रदेश की राजनीति के बड़े नेताओं को बहुत लोग जानते होंगे लेकिन जब उनका लेख, चौथा खम्भा बनने से इंकार‘ की कोई कड़ी छपती थी तो मुझे कुछ न कुछ नया जानने का अवसर मिलता था। मध्यप्रदेश के सभी बड़े नेताओं से उनका परिचय था। द्वारिका प्रसाद मिश्र और रविशंकर शुक्ल उनके पिता स्व मायाराम जी सुरजन के समकालीन थे, इस लिहाज से उनको वह सम्मान तो दिया लेकिन उनकी राजनीति का हथियार कभी नहीं बने। इन दो बड़े नेताओं के बाद की पीढ़ी के सभी नेताओं के बारे में ललित जी के अपने संस्मरण होते थे।

पत्रकारिता के सर्वोच्च मूल्यों की इतनी इज्जत करते थे कि कुछ नेताओं से निजी और घरेलू सम्बन्ध होने के बावजूद भी उन्होंने कभी भी अपने अखबार को किसी नेता के हित के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया।

दिल्ली, रायपुर, बिलासपुर, भोपाल, जबलपुर, सतना और सागर से छपने वाले अखबार को मायाराम जी की मान्यताओं के हिसाब से निकालते रहे।

ललित जी बहुत ही विनम्र और दृढ़ व्यक्ति थे अपनी सच्चाई से कभी समझौता नहीं किया। कई बार बड़ी कीमतें भी चुकाईं। अखबार चलाने में आर्थिक तंगी भी आई और अन्य परेशानियां भी हुईं लेकिन यह अजातशत्रु कभी झुका नहीं। उन्होंने कभी किसी से दुश्मनी नहीं की। जिन लोगों ने उनका नुकसान किया उनको भी हमेशा माफ करते रहे।

ललित सुरजन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कभी भी बदला लेने की भावना से काम नहीं किया।

ललित जी अपने भाइयों को बहुत प्यार करते थे। सभी भाइयों को देशबन्धु के अलग- अलग संस्करणों की जिम्मेदारी दे दी। आजकल वानप्रस्थ जीवन जी रहे थे लेकिन लेखन में एक दिन की भी चूक नहीं हुई। उनके बच्चों को मैं जानता हूं। बहुत ही विनम्र बेटियां हैं उनकी लेकिन दृढ़ता बेजोड़ है। आवाज ऊंची किये बिना कठोर बात कर देने की उनकी क्षमता मैंने देखी है। उनके दो दामादों को मैं जानता हूं। ऐसा लगता है कि हर काम में वे ललित जी की गरिमा को ध्यान में रखकर ही हाथ लगाते हैं।

ललित जी का जाना मेरे लिए बहुत बड़ा व्यक्तिगत नुकसान है। जब कभी किसी विषय पर मैंने कुछ बहुत अच्छा लिखा तो सबसे पहला फोन ललित जी का ही आता था।

उनकी तारीफ को मैं अपने लेखन की सर्टिफिकेट मानता हूं और उन यादों को आजीवन संजोकर रखूंगा। अगर कभी कुछ गड़बड़ लिखा तो अखबार के समूह सम्पादक राजीव जी को लिख देते थे कि शेष जी ने आज कुछ कमजोर लिखा है।

उनके साथ दिल्ली के खान मार्किट के बाहरी संस की किताब की दुकान पर जाना एक ऐसा अनुभव है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वह मेरे लिए एक शिक्षा की यात्रा भी होती थी। जो भी किताब छपी उसको उन्होंने अवश्य पढ़ा। बाहरी संस की दूकान पर काम करने वाला हर व्यक्ति उनको जानता था। उनके जाते ही उन किताबों को लाकर उनके सामने रख देता था जो नई-नई आई हुई रहती थीं। अभी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नई किताब आई है, उसका इंतजार वे बहुत बेसब्री से कर रहे थे।

लेकिन अभी किताब आई नहीं और वे उसको पढ़े बिना ही चले गए उनके जन्मदिन पर बधाई सन्देश का मैसेज करने के बाद मैं उनके फोन का इंतजार करता रहता था कि अब फोन आने वाला है। हुआ यह था उनके असली जन्मदिन और फेसबुक पर लिखित जन्मदिन में थोड़ा अंतर था। अगर गलत वाले दिन मैसेज लिख दिया तो फोन करके बताते थे, शेषजी आपसे गलती हो गई। जब किसी साल सही वाले पर मैसेज दे दिया तो कहते थे कि इस बार आपने सही मैसेज भेजा।

अब यह नौबत कभी नहीं आयेगी क्योंकि अब उनके जीवन में कराल काल ने एक पक्की तारीख लिख दी है। वह उनकी मृत्यु की तारीख है। इस मनहूस तारीख को उनका हर चाहने वाला कभी नहीं भुला पायेगा। उनके अखबार में मैं काम करता हूं लेकिन उन्होंने यह अहसास कभी नहीं होने दिया कि मैं कर्मचारी हूं। आज उनके जाने के बाद लगता है कि काल ने मेरा बड़ा भाई छीन लिया। आपको कभी नहीं भुला पाऊंगा ललित जी।

शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह हस्तक्षेप के संरक्षक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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उपाध्याय अमलेन्दु:
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